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PANDIT RADHESHYAM KATHAWACHAK KI NARI CHETNA (Research-based Literary Criticism)
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नवजागरण काल के युगपुरुष पं. राधेश्याम कथावाचक की रचनाओं में नारी का चित्रण मात्र पात्र-रचना नहीं, अपितु एक गहन नारी-चेतना का प्रखर और बहुआयामी उद्घाटन है। 'परिवर्तन' की लक्ष्मी-चंदा, 'मशरि.की हूर' की हमीदा, 'राधेश्याम रामायण' की सीता, 'वीर अभिमन्यु' की उत्तरा तथा 'कृष्णायन' की यशोदा-राधा जैसी नायिकाएँ परंपरा और आधुनिकता, त्याग और विद्रोह, सतीत्व और सामाजिक जागरण, शक्ति और संवेदना के अद्भुत समन्वय का प्रतीक बनकर उभरती हैं।
यह शोध-संग्रह कथावाचक जी की सर्जना में नारी-चेतना के विविध आयामों को समग्रता से उद्घाटित करता है। डॉ. आभा गुप्ता ठाकुर, प्रो. आशा, डॉ. अल्का मणि, प्रो. आनंदप्रकाश त्रिपाठी 'रत्नेश', डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल, डॉ. सुरेश सिंह राठौड़, डॉ. सत्यभामा, 
डॉ. जितेंद्र कुमार शर्मा 'ज्योति', अजय दाहिया, रमेश गौतम, रणजीत पांचाले, आचार्य देवेन्द्र देव, रवि प्रकाश, प्रियांशी तिवारी, सरोज बेनीवाल, आरती, कविता, अत्रिका यादव, वर्षा, अर्चना कुमावत, दिव्या सक्सेना, बालकीर्ति, डॉ. मनीषा मल्होत्रा तथा हिना गुप्ता जैसे विद्वानों, प्रो.फेसरों और शोधार्थियों के गंभीर आलेखों के माध्यम से यह सिद्ध होता है कि राधेश्याम कथावाचक नारी को केवल आदर्श की संकीर्ण परिधि में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, राष्ट्र-निर्माण, नैतिक शक्ति और सांस्कृतिक जागरण की सक्रिय वाहक मानते थे।
संपादक हरिशंकर शर्मा के कुशल संयोजन में यह संग्रह पं. राधेश्याम कथावाचक की नारी-कल्पना को समकालीन संदर्भ में पुनर्पाठित करता है। यह पुस्तक न केवल साहित्यिक शोध का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है, अपितु भारतीय नारी की सांस्कृतिक गरिमा, त्याग, संघर्ष और राष्ट्र-चेतना की प्रेरणादायी गाथा भी है। साहित्यकारों, शोधार्थियों, नाट्य-प्रेमियों तथा नारी-विचार के अध्येताओं के लिए यह संग्रह पठनीय है। 
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