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Panchwan Pahar

Gurdayal Singh

Rs. 125 Rs. 111

सुविख्यात पंजाबी कथाकार गुरदयाल सिंह का यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास एक विधवा स्त्री के अनथक जीवन-संघर्ष को यथार्थवादी फलक पर उकेरता है। भारतीय समाज में सामन्ती संस्कारों का सबसे बड़ा शिकार नारी ही रही है। उसकी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, कोई पहचान नहीं, और अगर वह विधवा या पुनर्विवाहिता है तो... Read More

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Description

सुविख्यात पंजाबी कथाकार गुरदयाल सिंह का यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास एक विधवा स्त्री के अनथक जीवन-संघर्ष को यथार्थवादी फलक पर उकेरता है। भारतीय समाज में सामन्ती संस्कारों का सबसे बड़ा शिकार नारी ही रही है। उसकी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, कोई पहचान नहीं, और अगर वह विधवा या पुनर्विवाहिता है तो न उसके जीवन में मानवीय भावनाओं का कोई स्थान है और न प्राणिक संवेदनाओं का। समाज में वह सिर्फ़ पाषाण-प्रतिमा की तरह जीवित रह सकती है अथवा ‘देवी’ की तरह मात्र पूजनीय बने रहकर। यही कारण है कि जब तक हीरा देवी समाज के इस जड़ परम्परावादी चौखटे में जड़ी रही, तब तक तो वह 'देवी' थी, पर जैसे ही उसने उसे तोड़ा, वैसे ही ‘कुलटा’ और ‘कुलबोरनी’ हो गई। इसके बावजूद, हीरा एक अपराजेय नारी-चरित्र है, और लेखक ने उसे अपनी गहरी प्रगतिशील जीवन-दृष्टि और पैने इतिहास-बोध के सहारे रचा है। हीरा देवी के अतिरिक्त केसरी, मदन मोहन और सुरेन्द्र इस कथाकृति के दूसरे ऐसे जीवन्त चरित्र हैं, जो कि हीरा के संघर्ष में प्रेरक और सहायक की भूमिका निभाते हैं।
पंजाबी से इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद स्वयं लेखक ने किया है, इसलिए मूल कृति का समूचा साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव इसमें सहज सुरक्षित है। Suvikhyat panjabi kathakar guradyal sinh ka ye mahattvpurn upanyas ek vidhva stri ke anthak jivan-sangharsh ko yatharthvadi phalak par ukerta hai. Bhartiy samaj mein samanti sanskaron ka sabse bada shikar nari hi rahi hai. Uski koi svtantr satta nahin, koi pahchan nahin, aur agar vah vidhva ya punarvivahita hai to na uske jivan mein manviy bhavnaon ka koi sthan hai aur na pranik sanvednaon ka. Samaj mein vah sirf pashan-pratima ki tarah jivit rah sakti hai athva ‘devi’ ki tarah matr pujniy bane rahkar. Yahi karan hai ki jab tak hira devi samaj ke is jad parampravadi chaukhte mein jadi rahi, tab tak to vah devi thi, par jaise hi usne use toda, vaise hi ‘kulta’ aur ‘kulborni’ ho gai. Iske bavjud, hira ek aprajey nari-charitr hai, aur lekhak ne use apni gahri pragatishil jivan-drishti aur paine itihas-bodh ke sahare racha hai. Hira devi ke atirikt kesri, madan mohan aur surendr is kathakriti ke dusre aise jivant charitr hain, jo ki hira ke sangharsh mein prerak aur sahayak ki bhumika nibhate hain. Panjabi se is upanyas ka hindi anuvad svayan lekhak ne kiya hai, isaliye mul kriti ka samucha sahityik aur sanskritik vaibhav ismen sahaj surakshit hai.