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Pagla Ghora

Badal Sarkar

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सुप्रसिद्ध नाटककार बादल सरकार की यह कृति बांग्ला और हिन्‍दी दोनों भाषाओं में अनेक बार मंचस्थ हो चुकी हैं। बांग्ला में शम्भू मित्र (‘बहुरूपी’, कलकत्ता) और हिन्‍दी में श्यामानन्‍द जालान (‘अनामिका’, कलकत्ता), सत्यदेव दुबे (‘थियेटर यूनिट’, बम्बई) तथा टी.पी. जैन (‘अभियान’, दिल्ली) ने इसे प्रस्तुत किया। गाँव का निर्जन श्मशान,... Read More

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Sold By: Rajkamal Categories: Rajkamal Prakashan Books Tags: Play
Description

सुप्रसिद्ध नाटककार बादल सरकार की यह कृति बांग्ला और हिन्‍दी दोनों भाषाओं में अनेक बार मंचस्थ हो चुकी हैं। बांग्ला में शम्भू मित्र (‘बहुरूपी’, कलकत्ता) और हिन्‍दी में श्यामानन्‍द जालान (‘अनामिका’, कलकत्ता), सत्यदेव दुबे (‘थियेटर यूनिट’, बम्बई) तथा टी.पी. जैन (‘अभियान’, दिल्ली) ने इसे प्रस्तुत किया।
गाँव का निर्जन श्मशान, कुत्ते के रोने की आवाज़, धू-धू करती चिता और शव को जलाने के लिए आए चार व्यक्ति—इन्हें लेकर नाटक का प्रारम्‍भ होता है। हठात् एक पाँचवाँ व्यक्ति भी उपस्थित हो जाता है—जलती हुई चिता से उठकर आई लड़की, जिसने किसी का प्रेम न पाने की व्यथा को सहने में असमर्थ होकर आत्महत्या कर ली थी और जिसके शव को जलाने के लिए मोहल्ले के ये चार व्यक्ति उदारतापूर्वक राजी हो गए थे। आत्महत्या करनेवाली लड़की के जीवन की घटनाओं की चर्चा करते हुए एक-एक करके चारों अपने अतीत की घटनाओं की ओर उन्मुख होते हैं, उन लड़कियों के, उप-घटनाओं के बारे में सोचने को बाध्य होते हैं जो उनके जीवन में आई थीं और जिनका दुखद अवसान उनके ही अन्याय-अविचार के कारण हुआ था ।
किन्तु ‘पगला घोड़ा’ में नाटककार का उद्देश्य न तो शमशान की बीभत्सता के चित्रण द्वारा बीभत्स रस की सृष्टि करना है और न ही अपराध-बोध का चित्रण। बादल बाबू के शब्दों में यह ‘मिष्टि प्रेमेर गल्प’ अर्थात् ‘मधुर प्रेम-कहानी’ है। Suprsiddh natakkar badal sarkar ki ye kriti bangla aur hin‍di donon bhashaon mein anek baar manchasth ho chuki hain. Bangla mein shambhu mitr (‘bahurupi’, kalkatta) aur hin‍di mein shyamanan‍da jalan (‘anamika’, kalkatta), satydev dube (‘thiyetar yunit’, bambii) tatha ti. Pi. Jain (‘abhiyan’, dilli) ne ise prastut kiya. Ganv ka nirjan shmshan, kutte ke rone ki aavaz, dhu-dhu karti chita aur shav ko jalane ke liye aae char vyakti—inhen lekar natak ka praram‍bha hota hai. Hathat ek panchavan vyakti bhi upasthit ho jata hai—jalti hui chita se uthkar aai ladki, jisne kisi ka prem na pane ki vytha ko sahne mein asmarth hokar aatmhatya kar li thi aur jiske shav ko jalane ke liye mohalle ke ye char vyakti udartapurvak raji ho ge the. Aatmhatya karnevali ladki ke jivan ki ghatnaon ki charcha karte hue ek-ek karke charon apne atit ki ghatnaon ki or unmukh hote hain, un ladakiyon ke, up-ghatnaon ke bare mein sochne ko badhya hote hain jo unke jivan mein aai thin aur jinka dukhad avsan unke hi anyay-avichar ke karan hua tha.
Kintu ‘pagla ghoda’ mein natakkar ka uddeshya na to shamshan ki bibhatsta ke chitran dvara bibhats ras ki srishti karna hai aur na hi apradh-bodh ka chitran. Badal babu ke shabdon mein ye ‘mishti premer galp’ arthat ‘madhur prem-kahani’ hai.

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