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Oos Ki Boond

Rahi Masoom Raza

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राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गाँव’ लिखकर हिन्दी-उपन्यास में अपना एक सुनिश्चित स्थान बनाया था। ‘टोपी शुक्ला’ उनका दूसरा सफल उपन्यास था और यह उनका तीसरा उपन्यास है। यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम समस्या को लेकर शुरू होता है लेकिन आख़िर तक आते-आते पाठकों को पता चलता है कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या वास्तव... Read More

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Description

राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गाँव’ लिखकर हिन्दी-उपन्यास में अपना एक सुनिश्चित स्थान बनाया था। ‘टोपी शुक्ला’ उनका दूसरा सफल उपन्यास था और यह उनका तीसरा उपन्यास है।
यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम समस्या को लेकर शुरू होता है लेकिन आख़िर तक आते-आते पाठकों को पता चलता है कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या वास्तव में कुछ नहीं है, यह सिर्फ़ राजनीति का एक मोहरा है, और जो असली चीज़ है वह है इंसान के पहलू में धड़कनेवाला दिल और उस दिल में रहनेवाले जज़्बात; और इन दोनों का मजहब और जात से कोई ताल्लुक नहीं। इसीलिए साम्प्रदायिक दंगों के बीच सच्ची इंसानियत की तलाश करनेवाला यह उपन्यास एक शहर और एक मजहब का होते हुए भी हर शहर और हर मजहब का है ! एक छोटी-सी ज़िंदगी की दर्द भरी दास्तान जो ओस की बूँद की तरह चमकीली और कम-उम्र है। Rahi masum raza ne ‘adha ganv’ likhkar hindi-upanyas mein apna ek sunishchit sthan banaya tha. ‘topi shukla’ unka dusra saphal upanyas tha aur ye unka tisra upanyas hai. Ye upanyas hindu-muslim samasya ko lekar shuru hota hai lekin aakhir tak aate-ate pathkon ko pata chalta hai ki hindu-muslim samasya vastav mein kuchh nahin hai, ye sirf rajniti ka ek mohra hai, aur jo asli chiz hai vah hai insan ke pahlu mein dhadaknevala dil aur us dil mein rahnevale jazbat; aur in donon ka majhab aur jaat se koi talluk nahin. Isiliye samprdayik dangon ke bich sachchi insaniyat ki talash karnevala ye upanyas ek shahar aur ek majhab ka hote hue bhi har shahar aur har majhab ka hai ! ek chhoti-si zindagi ki dard bhari dastan jo os ki bund ki tarah chamkili aur kam-umr hai.