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Nirvasan

Akhilesh

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अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ पारम्परिक ढंग का उपन्यास नहीं है। यह आधुनिकतावादी या जादुई यथार्थवादी भी नहीं। यथार्थवाद, आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद की ख़ूबियाँ सँजोए असल में यह भारतीय ढंग का उपन्यास है। यहाँ अमूर्त नहीं, बहुत ही वास्तविक, कारुणिक और दुखदायी निर्वासन है। सूत्र रूप में कहें तो यह... Read More

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Description

अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ पारम्परिक ढंग का उपन्यास नहीं है। यह आधुनिकतावादी या जादुई यथार्थवादी भी नहीं। यथार्थवाद, आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद की ख़ूबियाँ सँजोए असल में यह भारतीय ढंग का उपन्यास है। यहाँ अमूर्त नहीं, बहुत ही वास्तविक, कारुणिक और दुखदायी निर्वासन है। सूत्र रूप में कहें तो यह उपन्यास औपनिवेशिक आधुनिकता/ मानसिकता के कारण पैदा होनेवाले निर्वासन की महागाथा है जो पूँजीवादी संस्कृति की नाभि में पलते असन्तोष और मोहभंग को उद्घाटित करने के कारण राजनीतिक-वैचारिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। जॉर्ज लूकाच ने चेतना के दो रूपों का ज़िक्र किया है : वास्तविक चेतना तथा संभाव्य चेतना। लूकाच के मुताबिक़ संभाव्य चेतना को छूनेवाला उपन्यास वास्तविक चेतना के इर्द-गिर्द मँडरानेवाले उपन्यास से श्रेष्ठ है। कहने की ज़रूरत नहीं, ‘निर्वासन’ इस संभाव्य चेतना को स्पर्श कर रहा उपन्यास है जिसकी अभी सिर्फ़ कुछ आहटें आसपास सुनाई पड़ रही हैं।
आधुनिकता के सांस्कृतिक मूल्यों में अन्तर्निहित विडम्बनाओं का उद्घाटन करनेवाला अपने तरह का हिन्दी में लिखा गया यह पहला उपन्यास है। ‘निर्वासन’ सफलता और उपलब्धियों के प्रचलित मानकों को ही नहीं समस्याग्रस्त बनाता अपितु जीव-जगत के बारे में प्राय: सर्वमान्य सिद्ध सत्यों को भी प्रश्नांकित करता है। दूसरे धरातल पर यह उपन्यास अतीत की सुगम-सरल, भावुकतापूर्ण वापसी का प्रत्याख्यान है। वस्तुत: ‘निर्वासन’ के पूरे रचाव में ही जातिप्रथा, पितृसत्ता जैसे कई सामन्ती तत्त्वों की आलोचना विन्यस्त है। इस प्रकार ‘निर्वासन’ आधुनिकता के साथ भारतीयता की पुनरुत्थानवादी अवधारणा को भी निरस्त करता है।
लम्बे अर्से बाद ‘निर्वासन’ के रूप में ऐसा उपन्यास सामने है जिसमें समाज वैज्ञानिक सच की उपेक्षा नहीं है किन्तु उसे अन्तिम सच भी नहीं माना गया है। साहित्य की शक्ति और सौन्दर्य का बोध करानेवाले इस उपन्यास में अनेक इस तरह की चीज़ें हैं जो वैचारिक अनुशासनों में नहीं दिखेंगी। इसीलिए इसमें समाज वैज्ञानिकों के लिए ऐसा बहुत-कुछ है जो उनके उपलब्ध सच को पुनर्परिभाषित करने की सामर्थ्य रखता है।
कहना अनुचित न होगा कि उपन्यास की दुनिया में ‘निर्वासन’ एक नया और अनूठा प्रस्थान है।
—राजकुमार Akhilesh ka upanyas ‘nirvasan’ paramprik dhang ka upanyas nahin hai. Ye aadhuniktavadi ya jadui yatharthvadi bhi nahin. Yatharthvad, aadhuniktavad aur jadui yatharthvad ki khubiyan sanjoe asal mein ye bhartiy dhang ka upanyas hai. Yahan amurt nahin, bahut hi vastvik, karunik aur dukhdayi nirvasan hai. Sutr rup mein kahen to ye upanyas aupaniveshik aadhunikta/ manasikta ke karan paida honevale nirvasan ki mahagatha hai jo punjivadi sanskriti ki nabhi mein palte asantosh aur mohbhang ko udghatit karne ke karan rajnitik-vaicharik drishti se bhi mahattvpurn ho gaya hai. Jaurj lukach ne chetna ke do rupon ka zikr kiya hai : vastvik chetna tatha sambhavya chetna. Lukach ke mutabiq sambhavya chetna ko chhunevala upanyas vastvik chetna ke ird-gird mandranevale upanyas se shreshth hai. Kahne ki zarurat nahin, ‘nirvasan’ is sambhavya chetna ko sparsh kar raha upanyas hai jiski abhi sirf kuchh aahten aaspas sunai pad rahi hain. Aadhunikta ke sanskritik mulyon mein antarnihit vidambnaon ka udghatan karnevala apne tarah ka hindi mein likha gaya ye pahla upanyas hai. ‘nirvasan’ saphalta aur uplabdhiyon ke prachlit mankon ko hi nahin samasyagrast banata apitu jiv-jagat ke bare mein pray: sarvmanya siddh satyon ko bhi prashnankit karta hai. Dusre dharatal par ye upanyas atit ki sugam-saral, bhavuktapurn vapsi ka pratyakhyan hai. Vastut: ‘nirvasan’ ke pure rachav mein hi jatiprtha, pitrisatta jaise kai samanti tattvon ki aalochna vinyast hai. Is prkar ‘nirvasan’ aadhunikta ke saath bhartiyta ki punrutthanvadi avdharna ko bhi nirast karta hai.
Lambe arse baad ‘nirvasan’ ke rup mein aisa upanyas samne hai jismen samaj vaigyanik sach ki upeksha nahin hai kintu use antim sach bhi nahin mana gaya hai. Sahitya ki shakti aur saundarya ka bodh karanevale is upanyas mein anek is tarah ki chizen hain jo vaicharik anushasnon mein nahin dikhengi. Isiliye ismen samaj vaigyanikon ke liye aisa bahut-kuchh hai jo unke uplabdh sach ko punarparibhashit karne ki samarthya rakhta hai.
Kahna anuchit na hoga ki upanyas ki duniya mein ‘nirvasan’ ek naya aur anutha prasthan hai.
—rajakumar