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Netaji Kahin

Manohar Shyam Joshi

Rs. 150 Rs. 134

‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान में अनियमित रूप से प्रकाशित स्तम्भ ‘नेताजी कहिन’ के साथ कई विचित्रताएँ जुड़ी हैं। पहली तो यह कि सम्पादक ‘म. श्या. जो.’ को एक बार नेताजी पर छोटा-सा व्यंग्य लिखने के कारण पाठकों ने यह ‘सज़ा’ दी कि वह लगातार व्यंग्य-स्तम्भ लिखे, सम्पादकी न बघारे! दूसरी यह कि... Read More

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Vendor: Rajkamal Categories: Rajkamal Prakashan Books Tags: Satire
Description

‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान में अनियमित रूप से प्रकाशित स्तम्भ ‘नेताजी कहिन’ के साथ कई विचित्रताएँ जुड़ी हैं। पहली तो यह कि सम्पादक ‘म. श्या. जो.’ को एक बार नेताजी पर छोटा-सा व्यंग्य लिखने के कारण पाठकों ने यह ‘सज़ा’ दी कि वह लगातार व्यंग्य-स्तम्भ लिखे, सम्पादकी न बघारे! दूसरी यह कि समसामयिक घटनाओं को विषय बनाने के बावजूद यह स्तम्भ ‘सनातन’ में भी खूँटा गाड़े रहा। तीसरी यह कि राजनीतिक बिरादरी की संस्कारहीनता उजागर करनेवाले ये व्यंग्य कुछ महत्त्वपूर्ण पाठकों को स्वयं संस्कारहीन मालूम हुए। और चौथी यह कि बैसवाड़ी और भोजपुरी की छटा दिखाती ऐसी नेताई भाषा, कहते हैं, अब तक मात्र सुनी ही गई थी। लेकिन इस किताब में वह लिखी हुई, बल्कि बाक़ायदा छपी हुई है।
व्यंग्य इन लेखों का दुधारा है। नेताओं के साथ-साथ ‘किर्रुओं’ पर भी उसकी धार है। ‘किर्रू’ यानी जो नेताओं को कोसते भी रहते हैं और जीते भी रहते हैं उन्हीं के आसरे। दरअसल यहीं ‘म. श्या. जो.’ के व्यंग्य से बचाव मुश्किल है, क्योंकि तिलमिला उठता है हमारे ही भीतर बैठा कोई किर्रू! निश्चय ही ‘हिन्दुस्तान’ के नेताओं और ‘किर्रुओं’ पर किए गए ये व्यंग्य हिन्दी के ‘कामचलाऊ’ स्वरूप, राष्ट्रीय चरित्र और जातीय स्वभाव का बेहतरीन ख़ुलासा करते हैं। ‘saptahik hindustan mein aniymit rup se prkashit stambh ‘netaji kahin’ ke saath kai vichitrtayen judi hain. Pahli to ye ki sampadak ‘ma. Shya. Jo. ’ ko ek baar netaji par chhota-sa vyangya likhne ke karan pathkon ne ye ‘saza’ di ki vah lagatar vyangya-stambh likhe, sampadki na baghare! dusri ye ki samsamyik ghatnaon ko vishay banane ke bavjud ye stambh ‘sanatan’ mein bhi khunta gade raha. Tisri ye ki rajnitik biradri ki sanskarhinta ujagar karnevale ye vyangya kuchh mahattvpurn pathkon ko svayan sanskarhin malum hue. Aur chauthi ye ki baisvadi aur bhojapuri ki chhata dikhati aisi netai bhasha, kahte hain, ab tak matr suni hi gai thi. Lekin is kitab mein vah likhi hui, balki baqayda chhapi hui hai. Vyangya in lekhon ka dudhara hai. Netaon ke sath-sath ‘kirruon’ par bhi uski dhar hai. ‘kirru’ yani jo netaon ko koste bhi rahte hain aur jite bhi rahte hain unhin ke aasre. Darasal yahin ‘ma. Shya. Jo. ’ ke vyangya se bachav mushkil hai, kyonki tilamila uthta hai hamare hi bhitar baitha koi kirru! nishchay hi ‘hindustan’ ke netaon aur ‘kirruon’ par kiye ge ye vyangya hindi ke ‘kamachlau’ svrup, rashtriy charitr aur jatiy svbhav ka behatrin khulasa karte hain.