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Neelchandra

Rajendra Mohan Bhatnagar

Rs. 595.00

आप कोई भी हो, कहीं भी हो, सफल या असफल, घृणा, उपेक्षा, हिंसा, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार से लदे हो या इस प्रसाद को बाँटकर जश्न मना रहे हो फिर भी न अपनी मर्ज़ी से रो पाते हो और न ही हँस पाते हो तो एक काम करो-घर या बाहर, दिन... Read More

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Vendor: Vani Prakashan Categories: Vani Prakashan Tags: Novel
Description
आप कोई भी हो, कहीं भी हो, सफल या असफल, घृणा, उपेक्षा, हिंसा, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार से लदे हो या इस प्रसाद को बाँटकर जश्न मना रहे हो फिर भी न अपनी मर्ज़ी से रो पाते हो और न ही हँस पाते हो तो एक काम करो-घर या बाहर, दिन हो या रात, एक कोने में बैठकर, उथल-पुथल भरे मन की आँखों के सामने, हाथ में 'नीलचन्द्र' को बेहद चिड़चिड़े और कोफ़्त होते हुए लिए हो-उसके मुखपृष्ठ को सिर्फ़ देखो, देखते रहो, मन साथ दे या नहीं पर देखते रहो, एक दिन, दो दिन, तीन दिन या इससे अधिक दिन, चाहे जितनी देर देखो, पर देखते रहो। एक समय आयेगा 'नीलचन्द्र' को सामने न पाकर भी ध्यान उस पर ऐसा लग जायेगा कि हटाने से भी नहीं हटेगा। तब तुम एक आवाज़ सुनोगे, “अब ‘नीलचन्द्र' को खोलो, आहिस्ता से और मन करे तो पढ़ने लगो। जहाँ तक, जितना पढ़ सको, पढ़ते जाओ। कोई जल्दी नहीं है।" कुछ समय बाद तुम अपनी दिनचर्या में उस पढ़े को अपने अनुभव से गुज़रता पाओगे। तुम्हें विश्वास होने लगेगा कि जो सपने में भी नहीं सोचा था, वह तुम्हारे अनुभव का एक ज़रूरी हिस्सा बन चुका है। यह जानकर तुम्हें आश्चर्य होगा कि वह आवाज़ ईश्वर, अल्लाह, गॉड की नहीं, तुम्हारी है और यह रास्ता तुम्हारा खोजा है। यह सब बताने के लिए मुझे श्रीअरविन्द ने कहा है-कोई तप-साधना नहीं करनी, न कहीं आना-जाना है। जहाँ जिस मुद्रा में बैठे हो, वहीं से ‘नीलचन्द्र' शुरू कर देना, क्योंकि वहाँ भी मैं नहीं, तुम अपने को पाओगे। फिर इसका दूसरा भाग ‘आनन्द पथ' उठाओ। वह तुम्हारी ज़िन्दगी का बेशक़ीमती भाग है।