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Naqsh-E-Fariyadi

Faiz Ahmed 'Faiz', Tr. Abdul Bismillah

Rs. 150 Rs. 134

‘नक़्श-ए-फ़रियादी’ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का पहला कविता-संग्रह है जो पहली बार 1941 में प्रकाशित हुआ था। मुहब्बत और इन्क़लाब का जो अटूट अपनापा आगे चलकर फ़ैज़ की समूची शायरी की पहचान बना, उसकी बुनियाद इस संग्रह में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसमें बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक की... Read More

Description

‘नक़्श-ए-फ़रियादी’ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का पहला कविता-संग्रह है जो पहली बार 1941 में प्रकाशित हुआ था। मुहब्बत और इन्क़लाब का जो अटूट अपनापा आगे चलकर फ़ैज़ की समूची शायरी की पहचान बना, उसकी बुनियाद इस संग्रह में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसमें बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक की उनकी तहरीरें शामिल हैं, जब फ़ैज़ युवा थे और उनका दिलो-दिमाग़ एक तरफ़ ‘ग़मे-जानाँ’ से तो दूसरी तरफ़ ‘ग़मे-दौराँ’ से एक साथ वाबस्ता हो रहा था। स्वाभाविक ही है कि इस संग्रह के शुरुआती हिस्से में ग़मे-जानाँ का रंग गहरा नज़र आता है, जो आख़िरी हिस्से में पहुँचते-पहुँचते ग़मे-दौराँ के रंग में मिल जाता है।
और तब फ़ैज़ लिखते हैं, ‘मुझसे पहली-सी मुहब्बत मिरी महबूब न माँग’। गोकि इस सोच की शिनाख़्त शुरुआती हिस्से की तहरीरों में भी नामुमकिन नहीं है। मगर अहम बात यह है कि फ़ैज़ एलान करते हैं कि ग़मे-जानाँ और ग़मे-दौराँ एक ही तजुर्बे के दो पहलू हैं। यही वह एहसास है, जिससे उनकी शायरी तमाम सरहदों को लाँघती हुई पूरी दुनिया के अवाम की आवाज़ बन गई है। ‘नक़्श-ए-फ़रियादी’ इस एहसास का घोषणापत्र है। ‘naqsh-e-fariyadi’ faiz ahmad faiz ka pahla kavita-sangrah hai jo pahli baar 1941 mein prkashit hua tha. Muhabbat aur inqlab ka jo atut apnapa aage chalkar faiz ki samuchi shayri ki pahchan bana, uski buniyad is sangrah mein spasht rup se dikhai deti hai. Ismen bisvin sadi ke tisre-chauthe dashak ki unki tahriren shamil hain, jab faiz yuva the aur unka dilo-dimag ek taraf ‘game-janan’ se to dusri taraf ‘game-dauran’ se ek saath vabasta ho raha tha. Svabhavik hi hai ki is sangrah ke shuruati hisse mein game-janan ka rang gahra nazar aata hai, jo aakhiri hisse mein pahunchate-pahunchate game-dauran ke rang mein mil jata hai. Aur tab faiz likhte hain, ‘mujhse pahli-si muhabbat miri mahbub na mang’. Goki is soch ki shinakht shuruati hisse ki tahriron mein bhi namumkin nahin hai. Magar aham baat ye hai ki faiz elan karte hain ki game-janan aur game-dauran ek hi tajurbe ke do pahlu hain. Yahi vah ehsas hai, jisse unki shayri tamam sarahdon ko langhati hui puri duniya ke avam ki aavaz ban gai hai. ‘naqsh-e-fariyadi’ is ehsas ka ghoshnapatr hai.