BackBack
-11%

Nagpash Mein Stree

Ed. Gitashree

Rs. 495 Rs. 441

आज बाज़ार के दबाव और सूचना-संचार माध्यमों के फैलाव ने राजनीति, समाज और परिवार का चरित्र पूरी तरह बदल डाला है, मगर पितृसत्ता का पूर्वग्रह और स्त्री को देखने का उसका नज़रिया नहीं बदला है, जो एक तरफ़ स्त्री की देह को ललचाई नज़रों से घूरता है, तो दूसरी तरफ़... Read More

BlackBlack
Description

आज बाज़ार के दबाव और सूचना-संचार माध्यमों के फैलाव ने राजनीति, समाज और परिवार का चरित्र पूरी तरह बदल डाला है, मगर पितृसत्ता का पूर्वग्रह और स्त्री को देखने का उसका नज़रिया नहीं बदला है, जो एक तरफ़ स्त्री की देह को ललचाई नज़रों से घूरता है, तो दूसरी तरफ़ उससे कठोर यौन-शुचिता की अपेक्षा भी रखता है। पितृसत्ता का चरित्र वही है। हाँ, समाज में बड़े पैमाने पर सक्रिय और आत्मनिर्भर होती स्त्री की स्वतंत्र चेतना पर अंकुश लगाने के उसके हथकंडे ज़रूर बदले हैं। मगर ख़ुशी की बात यह है कि इसके बरक्स बड़े पैमाने पर आत्मनिर्भर होती स्त्रियों ने अब इस व्यवस्था से निबटने की रणनीति अपने-अपने स्तर पर तय करनी शुरू कर दी है।
आख़िर कब तक स्त्रियाँ ऐसे समय और नैतिकता की बाट जोहती रहेंगी जब उन्हें स्वतंत्र और सम्मानित इकाई के रूप में स्वीकार किया जाएगा? क्या यह वाकई ज़रूरी है कि स्त्रियाँ पुरुषों के साहचर्य को तलाशती रहें? क्यों स्त्री की प्राथमिकताओं में नई नैतिकता को जगह नहीं मिलनी चाहिए?
इस पुस्तक में साहित्य, पत्रकारिता, थिएटर, समाज-सेवा और कला-जगत की ऐसी ही कुछ प्रबुद्ध स्त्रियों ने पितृसत्ता द्वारा रची गई छद्म नैतिकता पर गहराई और गम्भीरता से चिन्तन किया है और स्त्री-मुक्ति के रास्तों की तलाश की है। प्रभा खेतान कहती हैं, ‘नारीवाद, राजनीति से सम्बन्धित नैतिक सिद्धान्तों को पहचानना होगा, ताकि सेवा जैसा नैतिक गुण राजनीतिक रूपान्तरण का आधार बन सके।’ Aaj bazar ke dabav aur suchna-sanchar madhymon ke phailav ne rajniti, samaj aur parivar ka charitr puri tarah badal dala hai, magar pitrisatta ka purvagrah aur stri ko dekhne ka uska nazariya nahin badla hai, jo ek taraf stri ki deh ko lalchai nazron se ghurta hai, to dusri taraf usse kathor yaun-shuchita ki apeksha bhi rakhta hai. Pitrisatta ka charitr vahi hai. Han, samaj mein bade paimane par sakriy aur aatmnirbhar hoti stri ki svtantr chetna par ankush lagane ke uske hathkande zarur badle hain. Magar khushi ki baat ye hai ki iske baraks bade paimane par aatmnirbhar hoti striyon ne ab is vyvastha se nibatne ki ranniti apne-apne star par tay karni shuru kar di hai. Aakhir kab tak striyan aise samay aur naitikta ki baat johti rahengi jab unhen svtantr aur sammanit ikai ke rup mein svikar kiya jayega? kya ye vakii zaruri hai ki striyan purushon ke sahcharya ko talashti rahen? kyon stri ki prathamiktaon mein nai naitikta ko jagah nahin milni chahiye?
Is pustak mein sahitya, patrkarita, thiyetar, samaj-seva aur kala-jagat ki aisi hi kuchh prbuddh striyon ne pitrisatta dvara rachi gai chhadm naitikta par gahrai aur gambhirta se chintan kiya hai aur stri-mukti ke raston ki talash ki hai. Prbha khetan kahti hain, ‘narivad, rajniti se sambandhit naitik siddhanton ko pahchanna hoga, taki seva jaisa naitik gun rajnitik rupantran ka aadhar ban sake. ’