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Nadi Mein Khada Kavi

Sharad Joshi

Rs. 595 Rs. 530

अस्सी की होने चली दादी ने विधवा होकर परिवार से पीठ कर खटिया पकड़ ली। परिवार उसे वापस अपने बीच खींचने में लगा। प्रेम, वैर, आपसी नोकझोंक में खदबदाता संयुक्त परिवार। दादी बज़िद कि अब नहीं उठूँगी। फिर इन्हीं शब्दों की ध्वनि बदलकर हो जाती है अब तो नई ही... Read More

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Description

अस्सी की होने चली दादी ने विधवा होकर परिवार से पीठ कर खटिया पकड़ ली। परिवार उसे वापस अपने बीच खींचने में लगा। प्रेम, वैर, आपसी नोकझोंक में खदबदाता संयुक्त परिवार। दादी बज़िद कि अब नहीं उठूँगी।
फिर इन्हीं शब्दों की ध्वनि बदलकर हो जाती है अब तो नई ही उठूँगी। दादी उठती है। बिलकुल नई। नया बचपन, नई जवानी, सामाजिक वर्जनाओं-निषेधों से मुक्त, नए रिश्तों और नए तेवरों में पूर्ण स्वच्छन्द।
कथा लेखन की एक नई छटा है इस उपन्यास में। इसकी कथा, इसका कालक्रम, इसकी संवेदना, इसका कहन, सब अपने निराले अन्दाज़ में चलते हैं। हमारी चिर-परिचित हदों-सरहदों को नकारते लाँघते। जाना-पहचाना भी बिलकुल अनोखा और नया है यहाँ। इसका संसार परिचित भी है और जादुई भी, दोनों के अन्तर को मिटाता। काल भी यहाँ अपनी निरन्तरता में आता है। हर होना विगत के होनों को समेटे रहता है, और हर क्षण सुषुप्त सदियाँ। मसलन, वाघा बार्डर पर हर शाम होनेवाले आक्रामक हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी राष्ट्रवादी प्रदर्शन में ध्वनित होते हैं ‘क़त्लेआम के माज़ी से लौटे स्वर’, और संयुक्त परिवार के रोज़मर्रा में सिमटे रहते हैं काल के लम्बे साए।
और सरहदें भी हैं जिन्हें लाँघकर यह कृति अनूठी बन जाती है, जैसे स्त्री और पुरुष, युवक और बूढ़ा, तन व मन, प्यार और द्वेष, सोना और जागना, संयुक्त और एकल परिवार, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, मानव और अन्य जीव-जन्तु (अकारण नहीं कि यह कहानी कई बार तितली या कौवे या तीतर या सड़क या पुश्तैनी दरवाज़े की आवाज़ में बयान होती है) या गद्य और काव्य : ‘धम्म से आँसू गिरते हैं जैसे पत्थर। बरसात की बूँद।’ Assi ki hone chali dadi ne vidhva hokar parivar se pith kar khatiya pakad li. Parivar use vapas apne bich khinchne mein laga. Prem, vair, aapsi nokjhonk mein khadabdata sanyukt parivar. Dadi bazid ki ab nahin uthungi. Phir inhin shabdon ki dhvani badalkar ho jati hai ab to nai hi uthungi. Dadi uthti hai. Bilkul nai. Naya bachpan, nai javani, samajik varjnaon-nishedhon se mukt, ne rishton aur ne tevron mein purn svachchhand.
Katha lekhan ki ek nai chhata hai is upanyas mein. Iski katha, iska kalakram, iski sanvedna, iska kahan, sab apne nirale andaz mein chalte hain. Hamari chir-parichit hadon-sarahdon ko nakarte langhate. Jana-pahchana bhi bilkul anokha aur naya hai yahan. Iska sansar parichit bhi hai aur jadui bhi, donon ke antar ko mitata. Kaal bhi yahan apni nirantarta mein aata hai. Har hona vigat ke honon ko samete rahta hai, aur har kshan sushupt sadiyan. Maslan, vagha bardar par har sham honevale aakramak hindustani aur pakistani rashtrvadi prdarshan mein dhvnit hote hain ‘qatleam ke mazi se laute svar’, aur sanyukt parivar ke rozmarra mein simte rahte hain kaal ke lambe saye.
Aur sarahden bhi hain jinhen langhakar ye kriti anuthi ban jati hai, jaise stri aur purush, yuvak aur budha, tan va man, pyar aur dvesh, sona aur jagna, sanyukt aur ekal parivar, hindustan aur pakistan, manav aur anya jiv-jantu (akaran nahin ki ye kahani kai baar titli ya kauve ya titar ya sadak ya pushtaini darvaze ki aavaz mein bayan hoti hai) ya gadya aur kavya : ‘dhamm se aansu girte hain jaise patthar. Barsat ki bund. ’