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Nacohus

Purushottam Agarwal

Rs. 150 Rs. 134

एक दशक पहले, आहत भावनाओं की हिंसक राजनीति के बढ़ते संकट पर टिप्पणी करते हुए, पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक व्यंग्य-लेख में, प्रस्ताव किया था, ‘आहट भावना आयोग का गठन’ कर ही दिया जाए... अब यह उपन्यास...ज़बान पर लगते जा रहे नित नए तालों की डरावनी ख़बर की पड़ताल करने के... Read More

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Description

एक दशक पहले, आहत भावनाओं की हिंसक राजनीति के बढ़ते संकट पर टिप्पणी करते हुए, पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक व्यंग्य-लेख में, प्रस्ताव किया था, ‘आहट भावना आयोग का गठन’ कर ही दिया जाए...
अब यह उपन्यास...ज़बान पर लगते जा रहे नित नए तालों की डरावनी ख़बर की पड़ताल करने के साथ ही, सूचना और मनोरंजन के सब तरफ़ पसरते जंजाल में, तकनीकी आतंक तले चेतना के हाशिए पर धकेले जा रहे विवेक की चीत्कार को स्वर देता है यह उपन्यास...
पुरुषोत्तम अग्रवाल का पहला उपन्यास ‘नाकोहस’ नई-नई गढ़ी जा रही वास्तविकता की पड़ताल के लिए गढ़े गए ‘बौनैसर’ और ऐसे अनेक विचारोत्तेजक शब्दों के कारण भी ध्यान खींचता है...
स्वयं ‘नाकोहस’ भी ऐसा ही एक शब्द है... Ek dashak pahle, aahat bhavnaon ki hinsak rajniti ke badhte sankat par tippni karte hue, purushottam agrval ne ek vyangya-lekh mein, prastav kiya tha, ‘ahat bhavna aayog ka gathan’ kar hi diya jaye. . . Ab ye upanyas. . . Zaban par lagte ja rahe nit ne talon ki daravni khabar ki padtal karne ke saath hi, suchna aur manoranjan ke sab taraf pasarte janjal mein, takniki aatank tale chetna ke hashiye par dhakele ja rahe vivek ki chitkar ko svar deta hai ye upanyas. . .
Purushottam agrval ka pahla upanyas ‘nakohas’ nai-nai gadhi ja rahi vastavikta ki padtal ke liye gadhe ge ‘baunaisar’ aur aise anek vicharottejak shabdon ke karan bhi dhyan khinchta hai. . .
Svayan ‘nakohas’ bhi aisa hi ek shabd hai. . .