BackBack
-11%

Mere Manch Ki Sargam

Piyush Mishra

Rs. 450 Rs. 401

जब होश सँभाला तो मैं सन् 1990 में अपने थियेटर ग्रुप 'एक्ट-वन आर्ट ग्रुप, नई दिल्ली' की बाँहों में था। उससे पहले अगर कुछ याद है तो चंद उँगलियों पर गिने जानेवाले दोस्त जो एक हथेली में ख़र्च हो जाएँगे, प्लस टू के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली में प्रवेश,... Read More

BlackBlack
Description

जब होश सँभाला तो मैं सन् 1990 में अपने थियेटर ग्रुप 'एक्ट-वन आर्ट ग्रुप, नई दिल्ली' की बाँहों में था। उससे पहले अगर कुछ याद है तो चंद उँगलियों पर गिने जानेवाले दोस्त जो एक हथेली में ख़र्च हो जाएँगे, प्लस टू के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली में प्रवेश, सन् 1983 से 1986 तक वहाँ का प्रवास, 'हैमलेट', 'नेक्रासोव' और 'मैन इक्वल्स मैन', स्व. फ्रिट्ज बेनेविट्ज नाम के गुरु और श्री रंजीत कपूर और श्री नसीरुद्दीन शाह जैसे सम्मानित सीनियरों से मुलाक़ात, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल में 18 दिन की पेशेवर हवाखोरी, 1989 में मुंबई कूच और 1990 में दिल्ली वापसी। और उसके बाद 'एक्ट-वन' से निकाह, उससे तलाक़ और फिर से निकाह।
इस संकलन में मेरी व्यक्तिगत शायरी या सिनेमा के गीत नहीं हैं। ये सिर्फ़ मेरे थियेटर के गीत हैं जिनको संगीतबद्ध या कम्पोज़ किया जा चुका है। इस संकलन में ये अपने ‘ओरिजिनल फ़ार्म' में हैं और इन पर मुझसे ज़्यादा मेरे उन करोड़ों दोस्तों का हक़ है जिनकी बढ़ती हुई तादाद से मेरा ख़ुदा भी मुझे नहीं बचा सकता।
बहरहाल ये गीत उस दौर के नाम जिसमें मैंने बड़ा होना सीखा...।
...उन सबके नाम जिनको धोखा देकर मैंने ये जाना कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।
...उन सबके नाम जिनसे मिले धोखे ने मुझे माफ़ी देने के महान गुण से परिचित कराया! Jab hosh sanbhala to main san 1990 mein apne thiyetar grup ekt-van aart grup, nai dilli ki banhon mein tha. Usse pahle agar kuchh yaad hai to chand ungliyon par gine janevale dost jo ek hatheli mein kharch ho jayenge, plas tu ke baad rashtriy natya vidyalay, dilli mein prvesh, san 1983 se 1986 tak vahan ka prvas, haimlet, nekrasov aur main ikvals main, sv. Phritj benevitj naam ke guru aur shri ranjit kapur aur shri nasiruddin shah jaise sammanit siniyron se mulaqat, rashtriy natya vidyalay rangmandal mein 18 din ki peshevar havakhori, 1989 mein mumbii kuch aur 1990 mein dilli vapsi. Aur uske baad ekt-van se nikah, usse talaq aur phir se nikah. Is sanklan mein meri vyaktigat shayri ya sinema ke git nahin hain. Ye sirf mere thiyetar ke git hain jinko sangitbaddh ya kampoz kiya ja chuka hai. Is sanklan mein ye apne ‘orijinal farm mein hain aur in par mujhse zyada mere un karodon doston ka haq hai jinki badhti hui tadad se mera khuda bhi mujhe nahin bacha sakta.
Baharhal ye git us daur ke naam jismen mainne bada hona sikha. . . .
. . . Un sabke naam jinko dhokha dekar mainne ye jana ki mujhe aisa nahin karna chahiye tha.
. . . Un sabke naam jinse mile dhokhe ne mujhe mafi dene ke mahan gun se parichit karaya!