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Matdan Kendra Par Jhapaki

Kedarnath Singh

Rs. 99

ये कविताएँ एक कवि का पक्ष रखती हैं जिसे केदार जी इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में आकर पक्षहीन हो चुके हम लोगों को सौंप रहे हैं। ये कविताएँ हिंसा के विशाल परदे के आगे एक मनुष्य का हिंसक होने से इनकार हैं—देखने में बहुत विनम्र, विनीत, लेकिन चट्टान-सा सख़्त,... Read More

Description

ये कविताएँ एक कवि का पक्ष रखती हैं जिसे केदार जी इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में आकर पक्षहीन हो चुके हम लोगों को सौंप रहे हैं। ये कविताएँ हिंसा के विशाल परदे के आगे एक मनुष्य का हिंसक होने से इनकार हैं—देखने में बहुत विनम्र, विनीत, लेकिन चट्टान-सा सख़्त, दृढ़ और निर्णायक।
ज़रूरी नहीं कि उनकी सूची में हमारा नाम हो ही, जिनका नाम किसी सूची में नहीं, उनकी भी एक दुनिया है, जिसका नेतृत्व पेड़ करते हैं, और आपस में टकराते सत्ता के काले-पीले-सफ़ेद नारों के बरक्स जिसके पास पृथ्वी के सबसे सटीक और सबसे सुन्दर नारे हैं। वे नारे जो नदियों को उनका पानी, चींटियों को उनके बिल और आँखों को उनकी झपकी लौटा देने की पैरवी कर रहे हैं। इस संग्रह को पढ़ते हुए हमें इन रवहीन नारों की ताक़त का अहसास होता है।
केदार जी अब हमारे बीच नहीं हैं, उनकी कविताओं का यह संकलन एक वसीयत की तरह हमारे पास रहेगा जिसमें संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु, मनुष्यता की देखरेख की ज़िम्मेदारी वे हमें सौंप रहे हैं।
‘‘पृथ्वी के सारे ख़ून एक हैं/एक ही यात्रा में/एक ही पृथ्वी-भर लम्बी देह में/दौड़ रहे हैं वे/...अरबों धड़कनें एक ही लय में/घुमा रही हैं दुनिया को/ हर ख़ून हर ख़ून से बतियाता है।''
ये कविताएँ अपने सहज, निरायास आग्रह के साथ हमें ख़ून से बातें करते ख़ून की आवाज़ सुनने को कहती हैं। ''क्षमा करें भद्रजन/यदि फिर पूछ रहा हूँ/...मेरे देश के एक हाथ को/एक खुले हुए भूखे मुँह तक पहुँचने में/कितने बरस लगते हैं?’’ यह एक निर्दलीय प्रश्न है, लेकिन निरपेक्ष नहीं, यह मनुष्यता की आहत कोख में चीख़ता प्रश्न है; उम्मीद है हम इसका जवाब ढूँढ़ने का प्रयास करेंगे! Ye kavitayen ek kavi ka paksh rakhti hain jise kedar ji ikkisvin sadi ki dusri dahai mein aakar pakshhin ho chuke hum logon ko saump rahe hain. Ye kavitayen hinsa ke vishal parde ke aage ek manushya ka hinsak hone se inkar hain—dekhne mein bahut vinamr, vinit, lekin chattan-sa sakht, dridh aur nirnayak. Zaruri nahin ki unki suchi mein hamara naam ho hi, jinka naam kisi suchi mein nahin, unki bhi ek duniya hai, jiska netritv ped karte hain, aur aapas mein takrate satta ke kale-pile-safed naron ke baraks jiske paas prithvi ke sabse satik aur sabse sundar nare hain. Ve nare jo nadiyon ko unka pani, chintiyon ko unke bil aur aankhon ko unki jhapki lauta dene ki pairvi kar rahe hain. Is sangrah ko padhte hue hamein in ravhin naron ki taqat ka ahsas hota hai.
Kedar ji ab hamare bich nahin hain, unki kavitaon ka ye sanklan ek vasiyat ki tarah hamare paas rahega jismen sansar ki sabse mulyvan vastu, manushyta ki dekhrekh ki zimmedari ve hamein saump rahe hain.
‘‘prithvi ke sare khun ek hain/ek hi yatra men/ek hi prithvi-bhar lambi deh men/daud rahe hain ve/. . . Arbon dhadaknen ek hi lay men/ghuma rahi hain duniya ko/ har khun har khun se batiyata hai.
Ye kavitayen apne sahaj, nirayas aagrah ke saath hamein khun se baten karte khun ki aavaz sunne ko kahti hain. Kshma karen bhadrjan/yadi phir puchh raha hun/. . . Mere desh ke ek hath ko/ek khule hue bhukhe munh tak pahunchane men/kitne baras lagte hain?’’ ye ek nirdliy prashn hai, lekin nirpeksh nahin, ye manushyta ki aahat kokh mein chikhta prashn hai; ummid hai hum iska javab dhundhane ka pryas karenge!