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Mat Hanso Padmavati

Nirmal Bhuradia

Rs. 95 – Rs. 200

मत हँसो पद्मावती – इस संग्रह की कहानियों में विविधता है। कुछ कहानियाँ बाल-मन को पकड़ती हैं, किसी में स्त्रियों की अन्तःव्यथा है तो कहीं आगामी भविष्य का चित्रण करने वाली विज्ञान कथा है। सरल - तरल और सामान्य कहानियों के साथ ही कुछ प्रयोगात्मक कहानियाँ भी यहाँ मौजूद हैं।... Read More

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Rs. 200
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मत हँसो पद्मावती – इस संग्रह की कहानियों में विविधता है। कुछ कहानियाँ बाल-मन को पकड़ती हैं, किसी में स्त्रियों की अन्तःव्यथा है तो कहीं आगामी भविष्य का चित्रण करने वाली विज्ञान कथा है। सरल - तरल और सामान्य कहानियों के साथ ही कुछ प्रयोगात्मक कहानियाँ भी यहाँ मौजूद हैं। लेकिन एक बात सभी कहानियों में है: लेखिका की अपने पात्रों पर गहन मनोवैज्ञानिक पकड़। अपने आसपास घटित हो रहे को समझने और अभिव्यक्त करने की दृष्टि भी है। प्रवाहमय भाषा में कही गयीं ये कहानियाँ भावोद्वेलन करती हैं, तो कहीं गप्प और क़िस्सागोई का सुख भी देती हैं। कहीं-कहीं लेखिका ने अपने समय की विडम्बनाओं पर चुटकियाँ भी ली हैं।पत्रकारिता के अनुभव, हरसूद के डूब में आने की त्रासदी, पुरुष की बेवफ़ाई, स्त्री पर आती उम्र, इन्सान की क्लोनिंग, अपनी देह की चरबी को लेकर किशोरियों की चिन्ता जैसे मुद्दे भी काल्पनिक पात्रों के ज़रिये इन कहानियों में आये हैं। जहाँ पात्र और स्थितियाँ काल्पनिक हैं, पर मुद्दा नहीं। मुद्दा और मनोविज्ञान असली है। इन कहानियों में निर्मला की क़लम जीवन की धड़कती हुई नब्ज़ पर हाथ रखती है। उसे टटोलती है। कहानियों की भाषा और कथ्य पाठकों को बाँधे रखता है। आखिर कथारस ही तो कहानी की जान है। इस संग्रह में पाठक को वह ज़रूर मिलेगा।
Description
मत हँसो पद्मावती – इस संग्रह की कहानियों में विविधता है। कुछ कहानियाँ बाल-मन को पकड़ती हैं, किसी में स्त्रियों की अन्तःव्यथा है तो कहीं आगामी भविष्य का चित्रण करने वाली विज्ञान कथा है। सरल - तरल और सामान्य कहानियों के साथ ही कुछ प्रयोगात्मक कहानियाँ भी यहाँ मौजूद हैं। लेकिन एक बात सभी कहानियों में है: लेखिका की अपने पात्रों पर गहन मनोवैज्ञानिक पकड़। अपने आसपास घटित हो रहे को समझने और अभिव्यक्त करने की दृष्टि भी है। प्रवाहमय भाषा में कही गयीं ये कहानियाँ भावोद्वेलन करती हैं, तो कहीं गप्प और क़िस्सागोई का सुख भी देती हैं। कहीं-कहीं लेखिका ने अपने समय की विडम्बनाओं पर चुटकियाँ भी ली हैं।पत्रकारिता के अनुभव, हरसूद के डूब में आने की त्रासदी, पुरुष की बेवफ़ाई, स्त्री पर आती उम्र, इन्सान की क्लोनिंग, अपनी देह की चरबी को लेकर किशोरियों की चिन्ता जैसे मुद्दे भी काल्पनिक पात्रों के ज़रिये इन कहानियों में आये हैं। जहाँ पात्र और स्थितियाँ काल्पनिक हैं, पर मुद्दा नहीं। मुद्दा और मनोविज्ञान असली है। इन कहानियों में निर्मला की क़लम जीवन की धड़कती हुई नब्ज़ पर हाथ रखती है। उसे टटोलती है। कहानियों की भाषा और कथ्य पाठकों को बाँधे रखता है। आखिर कथारस ही तो कहानी की जान है। इस संग्रह में पाठक को वह ज़रूर मिलेगा।

Additional Information
Book Type

Hardbound, Paperback

Publisher Vani Prakashan
Language Hindi
ISBN 978-9350008195
Pages 106
Publishing Year 2011

Mat Hanso Padmavati

मत हँसो पद्मावती – इस संग्रह की कहानियों में विविधता है। कुछ कहानियाँ बाल-मन को पकड़ती हैं, किसी में स्त्रियों की अन्तःव्यथा है तो कहीं आगामी भविष्य का चित्रण करने वाली विज्ञान कथा है। सरल - तरल और सामान्य कहानियों के साथ ही कुछ प्रयोगात्मक कहानियाँ भी यहाँ मौजूद हैं। लेकिन एक बात सभी कहानियों में है: लेखिका की अपने पात्रों पर गहन मनोवैज्ञानिक पकड़। अपने आसपास घटित हो रहे को समझने और अभिव्यक्त करने की दृष्टि भी है। प्रवाहमय भाषा में कही गयीं ये कहानियाँ भावोद्वेलन करती हैं, तो कहीं गप्प और क़िस्सागोई का सुख भी देती हैं। कहीं-कहीं लेखिका ने अपने समय की विडम्बनाओं पर चुटकियाँ भी ली हैं।पत्रकारिता के अनुभव, हरसूद के डूब में आने की त्रासदी, पुरुष की बेवफ़ाई, स्त्री पर आती उम्र, इन्सान की क्लोनिंग, अपनी देह की चरबी को लेकर किशोरियों की चिन्ता जैसे मुद्दे भी काल्पनिक पात्रों के ज़रिये इन कहानियों में आये हैं। जहाँ पात्र और स्थितियाँ काल्पनिक हैं, पर मुद्दा नहीं। मुद्दा और मनोविज्ञान असली है। इन कहानियों में निर्मला की क़लम जीवन की धड़कती हुई नब्ज़ पर हाथ रखती है। उसे टटोलती है। कहानियों की भाषा और कथ्य पाठकों को बाँधे रखता है। आखिर कथारस ही तो कहानी की जान है। इस संग्रह में पाठक को वह ज़रूर मिलेगा।