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Maitri

Teji Grover

Rs. 295 Rs. 266

Vani Prakashan

बहुत सारी कविता सदियों से जगहों के बारे में होती आयी है। पर ऐसी भी कविताएँ हुई हैं जो जगह बनाती हैं : अपनी जगह रचती हैं। वह जगह कहीं और नहीं होती न ही जानी-पहचानी जगहों से मिलती-जुलती है। वह सिर्फ़ कविता में होती है। तेजी ग्रोवर के इस... Read More

Description

बहुत सारी कविता सदियों से जगहों के बारे में होती आयी है। पर ऐसी भी कविताएँ हुई हैं जो जगह बनाती हैं : अपनी जगह रचती हैं। वह जगह कहीं और नहीं होती न ही जानी-पहचानी जगहों से मिलती-जुलती है। वह सिर्फ़ कविता में होती है। तेजी ग्रोवर के इस नये कविता संग्रह की कविताएँ मिलकर ऐसी ही जगह गढ़ती हैं। उनकी चित्रमयता, अन्तर्ध्वनियाँ और अनुगूँजे इधर-उधर की होते हुए भी उस जगह का सत्यापन हैं जो कविता से रची गयी है। दुख, अनगढ़ मृत्यु, सियाह पत्थर पर शब्द, कठपुतली की आँख, क्षिप्रा की सतह पर काई, हरा झोंका, श्वेताम्बरी, लौकी-हरा गिरगिट, शब्दों की आँच, एक बच्चे का सा उठ जाता मन, देहरियों पर नाचती हुई ओस की रोशनी, सूर्य की जगह कोयले, सितारों के बीच अवकाश आदि मिलकर और अलग-अलग भी उस जगह को रोशन करते हैं जो कविता ही बना सकती है। इन कविताओं में परिष्कार और परिपक्वता है। भाषा निरलंकार है, चित्रमय लेकिन दिगम्बर। उसमें संयम भी है और अधिक न कहने का संकोच भी। यह ऐसी कविता है जो संगीत की तरह मद्धिम लय में अपना लोक गढ़ती है और आपको धीरे-धीरे घेरती है पर ऐसे कि आप आक्रान्त न हों। वह भी बचे और आप भी बचें। उसकी मैत्री यही है कि वह मुक्त करती है क्योंकि वह मुक्त है। उसकी हिचकिचाती सी विवक्षा उसकी मुक्ति है। तेजी ग्रोवर की ये कविताएँ आज लिखी जा रही ज़्यादातर हिन्दी कविताओं से बिल्कुल अलग हैं। यह उन्हें एक ऐसी आभा देता है जो नाटकीय नहीं शान्त और मन्द है, लगभग मौन जैसा। वह आपको चकाचौंध और चीख-पुकार से हल्के से हाथ पकड़कर उधर ले जाती है जहाँ कुछ मौन है, कुछ शब्द हैं और कुछ ऐसी जगह जहाँ आप शायद ही पहले गये हों। -अशोक वाजपेयी bahut sari kavita sadiyon se jaghon ke bare mein hoti aayi hai. par aisi bhi kavitayen hui hain jo jagah banati hain : apni jagah rachti hain. vah jagah kahin aur nahin hoti na hi jani pahchani jaghon se milti julti hai. vah sirf kavita mein hoti hai. teji grovar ke is naye kavita sangrah ki kavitayen milkar aisi hi jagah gaDhti hain. unki chitramayta, antardhvaniyan aur anugunje idhar udhar ki hote hue bhi us jagah ka satyapan hain jo kavita se rachi gayi hai. dukh, angaDh mrityu, siyah patthar par shabd, kathaputli ki ankh, kshipra ki satah par kai, hara jhonka, shvetambri, lauki hara girgit, shabdon ki anch, ek bachche ka sa uth jata man, dehariyon par nachti hui os ki roshni, surya ki jagah koyle, sitaron ke beech avkash aadi milkar aur alag alag bhi us jagah ko roshan karte hain jo kavita hi bana sakti hai. in kavitaon mein parishkar aur paripakvta hai. bhasha nirlankar hai, chitrmay lekin digambar. usmen sanyam bhi hai aur adhik na kahne ka sankoch bhi. ye aisi kavita hai jo sangit ki tarah maddhim lay mein apna lok gaDhti hai aur aapko dhire dhire gherti hai par aise ki aap akrant na hon. vah bhi bache aur aap bhi bachen. uski maitri yahi hai ki vah mukt karti hai kyonki vah mukt hai. uski hichakichati si vivaksha uski mukti hai. teji grovar ki ye kavitayen aaj likhi ja rahi zyadatar hindi kavitaon se bilkul alag hain. ye unhen ek aisi aabha deta hai jo natkiy nahin shaant aur mand hai, lagbhag maun jaisa. vah aapko chakachaundh aur cheekh pukar se halke se haath pakaDkar udhar le jati hai jahan kuchh maun hai, kuchh shabd hain aur kuchh aisi jagah jahan aap shayad hi pahle gaye hon. ashok vajpeyi