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Main Aur Tum

Martin Buber, Tr. Nandkishore Acharya

Rs. 199 Rs. 177

अस्तित्ववादी चिन्तन-सरणी में सामान्यत: सार्त्र-कामू की ही बात की जाती है और आजकल हाइडेग्गर की भी; लेकिन एक कवि-कथाकार के लिए ही नहीं समाज के एकत्व का सपना देखनेवालों के लिए भी मार्टिन बूबर का दर्शन शायद अधिक प्रासंगिक है क्योंकि वह मानवीय जीवन के लिए दो बातें अनिवार्य मानते... Read More

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Description

अस्तित्ववादी चिन्तन-सरणी में सामान्यत: सार्त्र-कामू की ही बात की जाती है और आजकल हाइडेग्गर की भी; लेकिन एक कवि-कथाकार के लिए ही नहीं समाज के एकत्व का सपना देखनेवालों के लिए भी मार्टिन बूबर का दर्शन शायद अधिक प्रासंगिक है क्योंकि वह मानवीय जीवन के लिए दो बातें अनिवार्य मानते हैं : सहभागिता और पारस्परिकता।
अस्तित्ववादी दर्शन में अकेलापन मानव-जाति की यंत्रणा का मूल स्रोत है। लेकिन बूबर जैसे आस्थावादी अस्तित्ववादी इस अकेलेपन को अनुल्लंघनीय नहीं मानते, क्योंकि सहभागिता या संवादात्मकता में उसके अकेलेपन को सम्पन्नता मिलती है। इसे बूबर ‘मैं-तुम’ की सहभागिता, पारस्परिकता या ‘कम्यूनियन’ मानते हैं। यह ‘मैं-तुम’ अन्योन्याश्रित है। सार्त्र जैसे अस्तित्ववादियों के विपरीत बूबर ‘मैं’ का ‘अन्य’ के साथ सम्बन्ध अनिवार्यतया विरोध या तनाव का नहीं मानते, बल्कि ‘तुम’ के माध्यम से ‘मैं’ को सत्य की अनुभूति सम्भव होती है, अन्यथा वह ‘तुम’ नहीं रहता, ‘वह’ हो जाता है। यह ‘तुम’ या ‘ममेतर’ व्यक्ति भी है, प्रकृति भी और परम आध्यात्मिक सत्ता भी। 'मम’ और 'ममेतर’ का सम्बन्ध एक-दूसरे में विलीन हो जाने का नहीं, बल्कि ‘मैत्री’ का सम्बन्ध है। इसलिए बूबर की आध्यात्मिकता भी समाज-निरपेक्ष नहीं रहती बल्कि इस संसार में ही परम सत्ता या ईश्वर के वास्तविकीकरण के अनुभव में निहित होती है; लौकिक में आध्यात्मिक की यह पहचान कुछ-कुछ शुद्धाद्वैत जैसी लगती है।
विश्वास है कि ‘आई एंड दाऊ’ का यह अनुवाद हिन्दी पाठकों को इस महत्त्वपूर्ण दार्शनिक के चिन्तन को समझने की ओर आकर्षित कर सकेगा।
—प्राक्कथन से Astitvvadi chintan-sarni mein samanyat: sartr-kamu ki hi baat ki jati hai aur aajkal haideggar ki bhi; lekin ek kavi-kathakar ke liye hi nahin samaj ke ekatv ka sapna dekhnevalon ke liye bhi martin bubar ka darshan shayad adhik prasangik hai kyonki vah manviy jivan ke liye do baten anivarya mante hain : sahbhagita aur parasparikta. Astitvvadi darshan mein akelapan manav-jati ki yantrna ka mul srot hai. Lekin bubar jaise aasthavadi astitvvadi is akelepan ko anullanghniy nahin mante, kyonki sahbhagita ya sanvadatmakta mein uske akelepan ko sampannta milti hai. Ise bubar ‘main-tum’ ki sahbhagita, parasparikta ya ‘kamyuniyan’ mante hain. Ye ‘main-tum’ anyonyashrit hai. Sartr jaise astitvvadiyon ke viprit bubar ‘main’ ka ‘anya’ ke saath sambandh anivaryatya virodh ya tanav ka nahin mante, balki ‘tum’ ke madhyam se ‘main’ ko satya ki anubhuti sambhav hoti hai, anytha vah ‘tum’ nahin rahta, ‘vah’ ho jata hai. Ye ‘tum’ ya ‘mametar’ vyakti bhi hai, prkriti bhi aur param aadhyatmik satta bhi. Mam’ aur mametar’ ka sambandh ek-dusre mein vilin ho jane ka nahin, balki ‘maitri’ ka sambandh hai. Isaliye bubar ki aadhyatmikta bhi samaj-nirpeksh nahin rahti balki is sansar mein hi param satta ya iishvar ke vastavikikran ke anubhav mein nihit hoti hai; laukik mein aadhyatmik ki ye pahchan kuchh-kuchh shuddhadvait jaisi lagti hai.
Vishvas hai ki ‘ai end dau’ ka ye anuvad hindi pathkon ko is mahattvpurn darshnik ke chintan ko samajhne ki or aakarshit kar sakega.
—prakkthan se

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