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Maihar Ke Angana

Deepa Singh Raghuvanshi

Rs. 225.00

अवध की संस्कृति, सभ्यता और परम्परा हमारी धरोहर है। अवध उत्तर प्रदेश के 25 जनपदों का एक भू-भाग है, जिसे प्राचीन काल में कोशल के नाम से जाना जाता था। कोशल की राजधानी अयोध्या थी। 'अवध' का नाम अयोध्या से पड़ा और मेरा परम सौभाग्य है कि मेरा जन्म अवध... Read More

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Description
अवध की संस्कृति, सभ्यता और परम्परा हमारी धरोहर है। अवध उत्तर प्रदेश के 25 जनपदों का एक भू-भाग है, जिसे प्राचीन काल में कोशल के नाम से जाना जाता था। कोशल की राजधानी अयोध्या थी। 'अवध' का नाम अयोध्या से पड़ा और मेरा परम सौभाग्य है कि मेरा जन्म अवध की पावन भूमि अयोध्या में हुआ। जहाँ की विशेषता कला और संस्कृति का संगम अनन्त भण्डार विश्वविख्यात है। भारत की लोक कलाएँ विश्व की सबसे प्राचीन धरोहरों में से एक बहुरंगी, विविध और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। यहाँ की अनेक जातियों और जनजातियों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही पारम्परिक कलाओं को लोक कला के नाम से जाना जाता है। अवध में आलेखित चित्र मांगल्य के प्रतीक होते हैं। हमारे अवध की संस्कृति मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी हैं। यहाँ की संस्कृति में लोक कला बसती है, यहाँ के त्योहार लोक कला के बिना अधूरे हैं। एक वर्ष में बारह महीनों के अलग-अलग त्योहार होते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का प्रारम्भ चैत्र मास से शुरू होता है। अवध में इस माह में नव वर्ष का उत्सव मनाते हैं। इसी माह में वासन्ती नवरात्रि में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी का जन्म उत्सव मनाते हैं। इसी माह से बारह महीनों तक त्योहारों का क्रम चलता है। अवध में त्योहार, संस्कार और लोकजीवन चर्चा पर लोक चित्र बनाये जाते हैं। यहाँ पर बारह माह के प्रमुख त्योहार तथा सोलह संस्कार पर लोक चित्र बनाये जाते हैं जिनमें से प्रमुख संस्कार हैं-षष्ठी संस्कार, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार में-चौक पूरना, कोहबर, हाथ के थापे, मइहर द्वार, माई मौर आदि चित्र बनाये जाते हैं। तथा प्रमुख त्योहार वासन्ती नवरात्रि, रामनवमी, आषाढ़ी पूर्णिमा, नाग पंचमी, हरियाली तीज, हल षष्ठी, कृष्ण जन्माष्टमी, दशहरा, तुलसी पूजा, करवा चौथ, अहोई अष्टमी, दीपावली, भाई दूज, देवोत्थान एकादशी, होली आदि शुभ पर्वो, त्योहारों, उत्सवों आदि पर लोक चित्र बनाये जाने की विशेष परम्परा है। अवध में लोक चित्रों का उद्भव गाँव की माटी घर आँगन से हुआ है। सरलता और सादगी इसका भाव है, अवध में लोक चित्र बनाने की परम्परा का वर्णन रामायण में भी उल्लेखित है, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी के विवाह मण्डप में मणिरत्नों से चौक पूरा गया था वहीं रावण वध के बाद राम जी सीता के साथ अयोध्या वापस आने की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने भगवान के स्वागत में पूरी अयोध्या को सजाया था तथा रामराज्याभिषेक के समय भूमि पर रंगोली व चौक पूरना बनाये थे। इससे स्पष्ट होता है कि लोक कला का इतिहास, प्रागैतिहासिक इतिहास, आधुनिक इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि भारतीय सभ्यता। अवध में लोक चित्रकला भूमि तथा भित्ति दोनों पर बनाई जाती है। यह दो रूपों में पायी जाती है, जिनके प्रति पूजा की भावना होती है उन्हें भित्ति पर चित्रित किया जाता है और जिनमें शुभत्व और कल्याण की भावना होती है उन्हंा भूमि पर बनाया जाता है। यहाँ के चित्र पारम्परिक, लोक मांगलिक, सजीव और प्रभावशाली होते हैं, इन चित्रों की एक विशेषता रही है मंगल भावना, लोक जनहित, धार्मिक भावना, सुख समृद्धि, शान्ति की कामना, पारलौकिक शक्ति एवं आशीर्वाद, जीवन रक्षा के प्रयोजन हेतु लोक चित्र बनाये जाते हैं। यह चित्र प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर खड़िया, गेरू, चूना, कोयला, कुमकुम, काजल, सिन्दूर, फूलों और पत्तियों का रस आदि का प्रयोग कर फूलों के डंठल में रूई या कपड़ा लपेटकर या लेखनी अँगलियों की सहायता से चित्र बनाये जाते हैं। अवध की लोक चित्रकला अवध के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान रखते हुए लोक साहित्य, लोक परम्परा, लोक विश्वास, लोक कलाओं के साथ भगवान राम से जुड़े रहने के कारण यह अति विशिष्ट है। परन्तु यह लोक चित्रकलाएँ लगभग आज के समय में विलुप्त हो रही हैं। इस कला और संस्कृति को जिस तरह हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा है उसी तरह हम अपनी अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए मैं इस पुस्तक के माध्यम से इस कला को, इस धरोहर को सिद्धिवत करने व सँजोने का प्रयास कर रही हूँ ताकि हमारी भावी पीढ़ी तक यह पावन परम्पराएँ सदैव जीवित रह सकें। यह पुस्तक इसी लक्ष्य की प्राप्ति का एक प्रयास है। म आशा करती हूँ, 'मइहर के अँगना' अवध के सभी जन के साथ भारतीय लोक संस्कृति के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।