BackBack
-11%

Mahan Hastiyon Ke Antim Pal

Sukhendu Kumar

Rs. 350 Rs. 312

दर्शन के चिर प्रश्नों में मृत्यु के सवाल ने हर दौर के दार्शनिकों और विचारकों को व्याकुल किया है। लगभग सभी ने इसे समझने, इसकी व्याख्या करने और फिर जीवन-चक्र में इसकी भूमिका को जानने का प्रयास किया। लेकिन अन्तत: मृत्यु के रास्ते पर जाना पड़ा सबको ही। उन्हें भी... Read More

BlackBlack
Description

दर्शन के चिर प्रश्नों में मृत्यु के सवाल ने हर दौर के दार्शनिकों और विचारकों को व्याकुल किया है। लगभग सभी ने इसे समझने, इसकी व्याख्या करने और फिर जीवन-चक्र में इसकी भूमिका को जानने का प्रयास किया। लेकिन अन्तत: मृत्यु के रास्ते पर जाना पड़ा सबको ही। उन्हें भी जिन्होंने दिग-दिगन्त से अपनी ताक़त का लोहा मनवाया, और उन्हें भी जिन्होंने अपनी विनम्रता तथा आत्मबल से संसार को रहने लायक़, जीने लायक़ बनाया। जीवन अपने उरूज पर पहुँचकर जब ढलना शुरू होता है, हर किसी को मृत्यु की वास्तविकता लगातार ज़्यादा मूर्त दिखाई देने लगती है, चाहे वह कोई भी हो।
इस पुस्तक में मूल प्रश्न तो मृत्यु का ही है लेकिन उसका अवलोकन उन लोगों के सन्दर्भ में किया गया है जिन्हें हम 'अमर' कहते हैं, ऐसे लोग जो मरकर भी नहीं मरते। लेकिन पुस्तक का उद्देश्य यह दिखाना नहीं है कि मृत्यु ही अन्तिम सत्य है और जीवन का अन्तत: कोई अर्थ नहीं। इसका उद्देश्य मात्र इस साधारण जिज्ञासा को शान्त करना है कि जिन लोगों ने हमें जीवन के बड़े अर्थ दिए, उनके अन्तिम पल कैसे गुज़रे। अपने उपलब्धिपूर्ण जीवन को अन्तिम विदा कहते हुए उन्होंने जीवन और जगत को कैसे देखा और कैसे उन्होंने अपने जीने की व्याख्या की।
अनेक पाठकों ने हो सकता है कि अलग-अलग लोगों के जीवन-वृत्त को पढ़ते हुए इनमें से कुछ प्रसंग पढ़े हों, लेकिन यहाँ एक स्थान पर उन्हें पढ़ना हमें कुछ भिन्न निष्कर्षों तक ले जाएगा। Darshan ke chir prashnon mein mrityu ke saval ne har daur ke darshanikon aur vicharkon ko vyakul kiya hai. Lagbhag sabhi ne ise samajhne, iski vyakhya karne aur phir jivan-chakr mein iski bhumika ko janne ka pryas kiya. Lekin antat: mrityu ke raste par jana pada sabko hi. Unhen bhi jinhonne dig-digant se apni taqat ka loha manvaya, aur unhen bhi jinhonne apni vinamrta tatha aatmbal se sansar ko rahne layaq, jine layaq banaya. Jivan apne uruj par pahunchakar jab dhalna shuru hota hai, har kisi ko mrityu ki vastavikta lagatar zyada murt dikhai dene lagti hai, chahe vah koi bhi ho. Is pustak mein mul prashn to mrityu ka hi hai lekin uska avlokan un logon ke sandarbh mein kiya gaya hai jinhen hum amar kahte hain, aise log jo markar bhi nahin marte. Lekin pustak ka uddeshya ye dikhana nahin hai ki mrityu hi antim satya hai aur jivan ka antat: koi arth nahin. Iska uddeshya matr is sadharan jigyasa ko shant karna hai ki jin logon ne hamein jivan ke bade arth diye, unke antim pal kaise guzre. Apne uplabdhipurn jivan ko antim vida kahte hue unhonne jivan aur jagat ko kaise dekha aur kaise unhonne apne jine ki vyakhya ki.
Anek pathkon ne ho sakta hai ki alag-alag logon ke jivan-vritt ko padhte hue inmen se kuchh prsang padhe hon, lekin yahan ek sthan par unhen padhna hamein kuchh bhinn nishkarshon tak le jayega.

Additional Information
Color

Black

Publisher
Language
ISBN
Pages
Publishing Year