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Mahakaushal Anchal Ki Lokkathyen

Veriar Elwin

Rs. 999 Rs. 889

इस पुस्तक में संकलित महाकोशल अंचल की लोककथाओं को मध्य प्रदेश के मंडला, सिवनी, बालाघाट, बिलासपुर एवं रायपुर ज़िलों और रीवा, कवर्धा, सारंगढ़ और बस्तर से एकत्र किया गया है। इन कहानियों को स्थानीय जनजातियों के लोगों से सुनकर और बातचीत कर यहाँ लिपिबद्ध किया गया है। मध्यवर्ती भारत में... Read More

Description

इस पुस्तक में संकलित महाकोशल अंचल की लोककथाओं को मध्य प्रदेश के मंडला, सिवनी, बालाघाट, बिलासपुर एवं रायपुर ज़िलों और रीवा, कवर्धा, सारंगढ़ और बस्तर से एकत्र किया गया है। इन कहानियों को स्थानीय जनजातियों के लोगों से सुनकर और बातचीत कर यहाँ लिपिबद्ध किया गया है।
मध्यवर्ती भारत में प्रचलित कहानियों के अनेक रूप हैं। इनमें से कुछ को हम गद्य कह सकते हैं—सीधे–सीधे विवरण जिन्हें संकेतों और भंगिमाओं के माध्यम से सुनाया गया, फिर भी उनमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।
कुछ कहानियों में संवादों के अंशों को गाकर बताया गया था। सूक्तियाँ या पद्य लयबद्ध सरल धुनों में गाई गई थीं। किसी–किसी कहानी में सभी संवाद संगीत में नहीं थे। कुछ विशेष पद्य और भाव ही संगीत में थे। यह जानना दिलचस्प होगा कि कहानी का गाया हुआ अंश कहानी के साथ जुड़ा ही रहा जिससे इन कहानियों की आत्मीयता बनी रही।
प्रस्तुत पुस्तक आदिवासियों की कहानियों के ज़रिए हमें उनके नज़दीक ले जाती है। आदिवासियों के विभिन्न संस्कारों के साथ–साथ उनकी मासूमियत और भोलापन भी हमें इन कहानियों में देखने को मिलता है।
इसके अलावा इस पुस्तक को आनन्द के उद्देश्य से पढ़ा जाए तो यह और मनोरंजक तथा सरस लगेगी। Is pustak mein sanklit mahakoshal anchal ki lokakthaon ko madhya prdesh ke mandla, sivni, balaghat, bilaspur evan raypur zilon aur riva, kavardha, sarangadh aur bastar se ekatr kiya gaya hai. In kahaniyon ko sthaniy janjatiyon ke logon se sunkar aur batchit kar yahan lipibaddh kiya gaya hai. Madhyvarti bharat mein prachlit kahaniyon ke anek rup hain. Inmen se kuchh ko hum gadya kah sakte hain—sidhe–sidhe vivran jinhen sanketon aur bhangimaon ke madhyam se sunaya gaya, phir bhi unmen koi vishesh parivartan nahin aaya.
Kuchh kahaniyon mein sanvadon ke anshon ko gakar bataya gaya tha. Suktiyan ya padya laybaddh saral dhunon mein gai gai thin. Kisi–kisi kahani mein sabhi sanvad sangit mein nahin the. Kuchh vishesh padya aur bhav hi sangit mein the. Ye janna dilchasp hoga ki kahani ka gaya hua ansh kahani ke saath juda hi raha jisse in kahaniyon ki aatmiyta bani rahi.
Prastut pustak aadivasiyon ki kahaniyon ke zariye hamein unke nazdik le jati hai. Aadivasiyon ke vibhinn sanskaron ke sath–sath unki masumiyat aur bholapan bhi hamein in kahaniyon mein dekhne ko milta hai.
Iske alava is pustak ko aanand ke uddeshya se padha jaye to ye aur manoranjak tatha saras lagegi.