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Mahabhoj Natak

Mannu Bhandari

Rs. 300 Rs. 267

मन्नू भंडारी को इसका श्रेय जाना चाहिए कि उन्होंने अतिपरिचित परिस्थितियों के, इतने व्यापक फलक को, बिना किसी प्रचलित मुहावरे का शिकार हुए, समेट लिया है। इसी नाम से उनके चर्चित उपन्यास का यह नौ दृश्यीय नट्यान्तरण अत्यन्त यथार्थपरक और तर्कसंगत है। इस नाटक में हम समाज में सक्रिय अनेक... Read More

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Description

मन्नू भंडारी को इसका श्रेय जाना चाहिए कि उन्होंने अतिपरिचित परिस्थितियों के, इतने व्यापक फलक को, बिना किसी प्रचलित मुहावरे का शिकार हुए, समेट लिया है। इसी नाम से उनके चर्चित उपन्यास का यह नौ दृश्यीय नट्यान्तरण अत्यन्त यथार्थपरक और तर्कसंगत है। इस नाटक में हम समाज में सक्रिय अनेक ताक़तों और ग़रीबों के जीवन पर उनके प्रभाव की परिणतियों को दृश्य-दर-दृश्य खुलते देखते हैं।
...(मोहन) राकेश के बाद पहली बार हम इस नाटक में सुगठित संवादों का श्रवण-सुख भी पाते हैं।
—राजेंद्र पॉल; ‘फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस’।
‘महाभोज’ सामाजिक यथार्थ का रूखा अंकन मात्र नहीं है, यह बहुत सोचे-समझे, रचनात्मक डिज़ाइन की उत्पत्ति है, साथ ही बहुत सघन भी। इस नाटक को उन राजनीतिक नाट्य-रचनाओं में गिना जाएगा जो सिर्फ़ दर्शकों की भावनाओं और आक्रोश का दोहन मात्र नहीं करतीं, बल्कि यथार्थ की क्रूर और विचलित करनेवाली छवि के शक्तिशाली प्रक्षेपण के द्वारा दर्शक की नैतिक संवेदना को चुनौती देती हैं और उन्हें अपने विवेक की खोज में प्रवृत्त करती हैं।
—अग्नेश्का सोनी; ‘पेट्रियट’।
और सबसे ज़्यादा यह उपन्यास/नाटक मन्नू भंडारी की संवेदनशील जागरूकता की एक देन है और नाटककारों की श्रेणी में उनके चिर-अभीप्सित आगमन का प्रमाण भी।
—कविता नागपाल; ‘द हिन्दुस्तान टाइम्स’। Mannu bhandari ko iska shrey jana chahiye ki unhonne atiparichit paristhitiyon ke, itne vyapak phalak ko, bina kisi prachlit muhavre ka shikar hue, samet liya hai. Isi naam se unke charchit upanyas ka ye nau drishyiy natyantran atyant yatharthaprak aur tarksangat hai. Is natak mein hum samaj mein sakriy anek taqton aur garibon ke jivan par unke prbhav ki parinatiyon ko drishya-dar-drishya khulte dekhte hain. . . . (mohan) rakesh ke baad pahli baar hum is natak mein sugthit sanvadon ka shrvan-sukh bhi pate hain.
—rajendr paul; ‘fainenshiyal eksapres’.
‘mahabhoj’ samajik yatharth ka rukha ankan matr nahin hai, ye bahut soche-samjhe, rachnatmak dizain ki utpatti hai, saath hi bahut saghan bhi. Is natak ko un rajnitik natya-rachnaon mein gina jayega jo sirf darshkon ki bhavnaon aur aakrosh ka dohan matr nahin kartin, balki yatharth ki krur aur vichlit karnevali chhavi ke shaktishali prakshepan ke dvara darshak ki naitik sanvedna ko chunauti deti hain aur unhen apne vivek ki khoj mein prvritt karti hain.
—agneshka soni; ‘petriyat’.
Aur sabse zyada ye upanyas/natak mannu bhandari ki sanvedanshil jagrukta ki ek den hai aur natakkaron ki shreni mein unke chir-abhipsit aagman ka prman bhi.
—kavita nagpal; ‘da hindustan taims’.