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Mahabazar Ke Mahanayak

Prahlad Agarwal

Rs. 350 Rs. 312

सिनेमा कला का वह रूप है जो बाज़ार की शर्तों पर भी चलता है, और बाज़ार के लिए नई शर्तें और मे'आर भी तय करता है। भारत में यही एकमात्र आर्ट है जिसकी रचना बाज़ार को ध्यान में रखकर की जाती है; वह बाज़ार जिसमें जनता ख़रीदार है, उसी की... Read More

Description

सिनेमा कला का वह रूप है जो बाज़ार की शर्तों पर भी चलता है, और बाज़ार के लिए नई शर्तें और मे'आर भी तय करता है। भारत में यही एकमात्र आर्ट है जिसकी रचना बाज़ार को ध्यान में रखकर की जाती है; वह बाज़ार जिसमें जनता ख़रीदार है, उसी की पसन्द-नापसन्द से सिनेमाई उत्पाद का भविष्य तय होता है। प्रहलाद अग्रवाल हिन्दी के उन गिने-चुने लेखकों में हैं जिन्होंने सिनेमा के उतार-चढ़ाव पर हमेशा निगाह रखी है, नए ट्रेंड्स को पकड़ा है, सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों में उनकी व्याख्याएँ की हैं, और फ़िल्मी गॉसिप की जगह सिनेमा का एक भाषिक विमर्श रचने का प्रयास किया है। इस पद्यात्मक किताब में वे यही काम थोड़ा अलग ढंग से कर रहे हैं। इसमें उनकी कुछ लम्बी कविताएँ ली गई हैं जिनका विषय हिन्दी सिनेमा, उसके नायक-महानायक, सपनों की उस नगरी के भीतरी यथार्थ, उसके आदर्श, समाज के साथ उसके रिश्तों पर उन्होंने एक ख़ास तरंग में अपनी अनुभूतियों को बुना है। कह सकते हैं कि यह हिन्दी फिल्मों के स्याह-सफ़ेद की काव्यात्मक व्याख्या है, जिसे पढ़ने का अपना आनन्द है।
इसे पढ़ते हुए हमें सूचनाएँ भी मिलती हैं और विचार भी। इसमें फ़िल्म पत्रकारिता का स्वाद भी है और कविता भी। Sinema kala ka vah rup hai jo bazar ki sharton par bhi chalta hai, aur bazar ke liye nai sharten aur mear bhi tay karta hai. Bharat mein yahi ekmatr aart hai jiski rachna bazar ko dhyan mein rakhkar ki jati hai; vah bazar jismen janta kharidar hai, usi ki pasand-napsand se sinemai utpad ka bhavishya tay hota hai. Prahlad agrval hindi ke un gine-chune lekhkon mein hain jinhonne sinema ke utar-chadhav par hamesha nigah rakhi hai, ne trends ko pakda hai, samajik-rajnitik sandarbhon mein unki vyakhyayen ki hain, aur filmi gausip ki jagah sinema ka ek bhashik vimarsh rachne ka pryas kiya hai. Is padyatmak kitab mein ve yahi kaam thoda alag dhang se kar rahe hain. Ismen unki kuchh lambi kavitayen li gai hain jinka vishay hindi sinema, uske nayak-mahanayak, sapnon ki us nagri ke bhitri yatharth, uske aadarsh, samaj ke saath uske rishton par unhonne ek khas tarang mein apni anubhutiyon ko buna hai. Kah sakte hain ki ye hindi philmon ke syah-safed ki kavyatmak vyakhya hai, jise padhne ka apna aanand hai. Ise padhte hue hamein suchnayen bhi milti hain aur vichar bhi. Ismen film patrkarita ka svad bhi hai aur kavita bhi.