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Madhyakaleen Bharat : Naye Aayam

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सुविख्यात व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई के इन संस्मरणात्मक शब्दचित्रों को पढ़ना एक नई अनुभव-यात्रा के समान है। इस अनुभव-यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि लेखक ने यहाँ अपने समकालीनों के रूप में कुछ साहित्यिक व्यक्तियों की ही चर्चा नहीं की है, बल्कि कुछ ग़ैर-साहित्यिक व्यक्तियों को भी गहरी... Read More

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Description

सुविख्यात व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई के इन संस्मरणात्मक शब्दचित्रों को पढ़ना एक नई अनुभव-यात्रा के समान है। इस अनुभव-यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि लेखक ने यहाँ अपने समकालीनों के रूप में कुछ साहित्यिक व्यक्तियों की ही चर्चा नहीं की है, बल्कि कुछ ग़ैर-साहित्यिक व्यक्तियों को भी गहरी आत्मीयता से उकेरा है। संग्रह के इस वैशिष्ट्य को परसाई जी ने स्वयं अपने ख़ास अन्दाज़ में इस प्रकार रेखांकित किया है—‘मेरे समकालीन’ जो यह लेख और चरित्रमाला लिखने की योजना है, तो सवाल है, मेरे समकालीन कौन? क्या सिर्फ़ लेखक? डॉक्टर के समकालीन डॉक्टर और चमार के समकालीन चमार? इसी तरह लेखक के समकालीन क्या सिर्फ़ लेखक? नहीं।...लेखकों, बुद्धिजीवी मित्रों के सिवा ये ‘छोटे’ कहलानेवाले लोग भी मेरे समकालीन हैं। मैं इन पर भी लिखूँगा।
फिर भी जिन जाने-अनजाने साहित्यिकों का उन्होंने यहाँ स्मरण किया है, वे हैं—श्रीकान्त वर्मा, केशव पाठक, प्रभात कुमार त्रिपाठी ‘प्रभात’, ब्रजकिशोर चतुर्वेदी, रामविलास शर्मा, शमशेर बहादुर सिंह, नामवर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी और सोमदत्त। इनके अतिरिक्त ‘मेरे समकालीन’ शीर्षक लेख में परसाई जी ने कुछ और साहित्यिकों को भी प्रसंगत: याद किया है।
वस्तुत: यह कृति परसाई सरीखे रचनाकार के गम्भीर रचनात्मक सरोकारों के साथ-साथ उनकी आत्मीय और सजग सामाजिकता का भी मूल्यवान साक्ष्य पेश करती है। Suvikhyat vyangya lekhak harishankar parsai ke in sansmarnatmak shabdchitron ko padhna ek nai anubhav-yatra ke saman hai. Is anubhav-yatra ka ek mahattvpurn pahlu ye hai ki lekhak ne yahan apne samkalinon ke rup mein kuchh sahityik vyaktiyon ki hi charcha nahin ki hai, balki kuchh gair-sahityik vyaktiyon ko bhi gahri aatmiyta se ukera hai. Sangrah ke is vaishishtya ko parsai ji ne svayan apne khas andaz mein is prkar rekhankit kiya hai—‘mere samkalin’ jo ye lekh aur charitrmala likhne ki yojna hai, to saval hai, mere samkalin kaun? kya sirf lekhak? dauktar ke samkalin dauktar aur chamar ke samkalin chamar? isi tarah lekhak ke samkalin kya sirf lekhak? nahin. . . . Lekhkon, buddhijivi mitron ke siva ye ‘chhote’ kahlanevale log bhi mere samkalin hain. Main in par bhi likhunga. Phir bhi jin jane-anjane sahityikon ka unhonne yahan smran kiya hai, ve hain—shrikant varma, keshav pathak, prbhat kumar tripathi ‘prbhat’, brajakishor chaturvedi, ramavilas sharma, shamsher bahadur sinh, namvar sinh, makhanlal chaturvedi aur somdatt. Inke atirikt ‘mere samkalin’ shirshak lekh mein parsai ji ne kuchh aur sahityikon ko bhi prsangat: yaad kiya hai.
Vastut: ye kriti parsai sarikhe rachnakar ke gambhir rachnatmak sarokaron ke sath-sath unki aatmiy aur sajag samajikta ka bhi mulyvan sakshya pesh karti hai.

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