BackBack
-11%Sold out

Lopamudra

Rs. 150 Rs. 134

गुजराती के सुविख्यात उपन्यासकार के.एम. मुंशी के इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास में गाधिपुत्र विश्वरथ (जो बाद में ऋषि विश्वामित्र के रूप में विख्यात हुए) के जन्म और बाल्यकाल की मुग्धकारी कथा वर्णित है। उनका अगस्त्य ऋषि के पास विद्याध्ययन, दस्युराज शंबर द्वारा अपहरण, शंबर-कन्या उग्रा से प्रेम-सम्बन्ध, फलस्वरूप एक लम्बा विचार-संघर्ष... Read More

Description

गुजराती के सुविख्यात उपन्यासकार के.एम. मुंशी के इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास में गाधिपुत्र विश्वरथ (जो बाद में ऋषि विश्वामित्र के रूप में विख्यात हुए) के जन्म और बाल्यकाल की मुग्धकारी कथा वर्णित है। उनका अगस्त्य ऋषि के पास विद्याध्ययन, दस्युराज शंबर द्वारा अपहरण, शंबर-कन्या उग्रा से प्रेम-सम्बन्ध, फलस्वरूप एक लम्बा विचार-संघर्ष और इस समूचे घटनाक्रम में अत्यन्त तेजस्वी, अनिंद्य सुन्दरी तथा ऋषि-पद प्राप्त लोपामुद्रा की रचनात्मक भूमिका का इसमें प्रभावी अंकन हुआ है। साथ ही महर्षि अगस्त्य से लोपा का प्रेम, जो समूची कथा में अन्तःस्रोत की तरह प्रवाहित है, पाठक को कुछ नए मूल्य भी सौंपता है।
वस्तुतः आर्यावर्त्त की महागाथा का यह एक ऐसा कीर्तिमान अध्याय है जिसमें हमारी सभ्यता और संस्कृति के कितने ही दुर्लभ रत्न बिखरे पड़े हैं। इसमें जो एक ताप विद्यमान है, उसमें हमें निरन्तर एक नया युग ढलता दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में, यह कथा आर्यजाति के महोत्कर्ष के उन प्रतीकों की है, जो आज भी परिवर्तनशील दौर से गुज़रते इस महादेश के सन्दर्भ में एकदम प्रासंगिक हैं। वीरता और शौर्य, साधना और संघर्ष, प्रेम और बलिदान के वे सारे प्रसंग और जीवन-मूल्य, जो लोपामुद्रा और विश्वामित्र का प्रभामंडल बनाते हैं, आज की भी सर्वोच्च प्राथमिकता बनकर उभरते हैं। निश्चय ही, मुंशी जी की यह कथाकृति इतिहास को तीव्र राग की तरह और जिजीविषा को गंध-समान प्रस्तुत करती है। Gujrati ke suvikhyat upanyaskar ke. Em. Munshi ke is mahattvpurn upanyas mein gadhiputr vishvrath (jo baad mein rishi vishvamitr ke rup mein vikhyat hue) ke janm aur balykal ki mugdhkari katha varnit hai. Unka agastya rishi ke paas vidyadhyyan, dasyuraj shambar dvara apahran, shambar-kanya ugra se prem-sambandh, phalasvrup ek lamba vichar-sangharsh aur is samuche ghatnakram mein atyant tejasvi, anindya sundri tatha rishi-pad prapt lopamudra ki rachnatmak bhumika ka ismen prbhavi ankan hua hai. Saath hi maharshi agastya se lopa ka prem, jo samuchi katha mein antःsrot ki tarah prvahit hai, pathak ko kuchh ne mulya bhi saumpta hai. Vastutः aaryavartt ki mahagatha ka ye ek aisa kirtiman adhyay hai jismen hamari sabhyta aur sanskriti ke kitne hi durlabh ratn bikhre pade hain. Ismen jo ek taap vidyman hai, usmen hamein nirantar ek naya yug dhalta dikhai deta hai. Dusre shabdon mein, ye katha aaryjati ke mahotkarsh ke un prtikon ki hai, jo aaj bhi parivartanshil daur se guzarte is mahadesh ke sandarbh mein ekdam prasangik hain. Virta aur shaurya, sadhna aur sangharsh, prem aur balidan ke ve sare prsang aur jivan-mulya, jo lopamudra aur vishvamitr ka prbhamandal banate hain, aaj ki bhi sarvochch prathamikta bankar ubharte hain. Nishchay hi, munshi ji ki ye kathakriti itihas ko tivr raag ki tarah aur jijivisha ko gandh-saman prastut karti hai.