Lal Grah
| Item Weight | 150 Gram |
| ISBN | 978-93-4928-607-8 |
| Author | Prabhat |
| Language | Hindi |
| Publisher | Jugnoo Prakashan, an imprint of Ektara Trust |
| Pages | 20 |
| Dimensions | 21.59 x 21.59 x 1 cm |
| Publishing year | 2026 |
| Edition | 1st |
Lal Grah
गाँव में जंगली जानवरों के हमलों की कहानियाँ अखबारों में जगह पाती रहती हैं। उनके मार गिराए जाने की और राहत महसूस करते लोगों की तस्वीर सोशल मीडिया में लाइक्स बटोरती मिलेगी। लाल ग्रह की कहानी भी गाँव में घुस आए एक बघेरे की है। पर फर्क यह कि यह कुछ-कुछ बघेरे की ज़बानी है। वो जंगल में चलता-चलता यहाँ पहुँचा था। पहले वो बहुत चलता तो भी जंगल में ही पहुँचता था। उसे क्या पता होगा अब जिस जगह पहुँच है वो जंगल नहीं है। वहाँ जंगल की सुरक्षा नहीं है। यहाँ लगे पौधों की उम्र जंगल के पेड़ों सी नहीं है। ये आते हैं और चार-छह महीनों में काट लिए जाते हैं। सो वो कैसे किसी को बचा सकते हैं। इंसान की उम्न लम्बी है। इस लम्बी उम्र को गुज़ारने उसे कितना कुछ कम पड़ सकता है - खाना, पानी, हवा। पर वो इंतज़ार कर सकता है। उसके पास उम्र पड़ी है। अभी मंगल देखा। अगले 13 साल बाद फिर मंगल पास आएगा। वो देख लेगा। पर बघेरे के लिए जो है वो यही है। आज का खेत। आज की सुरक्षा। आज का देखना। आज का मंगल ग्रह। प्रभात की एक और कहानी जिसे सिर्फ वही लिख सकते हैं।
लोक कथाओं का सा जामा पहने इस कहानी के चित्रों में भी वही रंगत देखी जा सकती है।
ISBN - 978-93-4928-607-8
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