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Lakshagrih Evam Anya Natak

Vratya Basu

Rs. 395 Rs. 352

बांग्ला के प्रख्यात नाटककार और रंगकर्मी व्रात्य बसु से हिन्दी के पाठक अपरिचित नहीं हैं। वर्षों पहले ‘चतुष्कोण' शीर्षक से उनके चार नाटकों का संग्रह हिन्दी में अनूदित होकर आ चुका है, जिसे नाटक-प्रेमी पाठकों के साथ-साथ रंगकर्मियों ने भी बहुत उत्साह के साथ स्वीकार किया। इस संग्रह में उनके... Read More

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Description

बांग्ला के प्रख्यात नाटककार और रंगकर्मी व्रात्य बसु से हिन्दी के पाठक अपरिचित नहीं हैं। वर्षों पहले ‘चतुष्कोण' शीर्षक से उनके चार नाटकों का संग्रह हिन्दी में अनूदित होकर आ चुका है, जिसे नाटक-प्रेमी पाठकों के साथ-साथ रंगकर्मियों ने भी बहुत उत्साह के साथ स्वीकार किया।
इस संग्रह में उनके तीन नाटक संकलित हैं—‘लाक्षागृह’, ‘संध्या की आरजू में भोर का सरसों फूल’ और ‘बम’ (बोमा)। व्रात्य बसु का नाटककार अपने समय को लक्षित होता है लेकिन जहाँ से वे अपने वर्तमान को देखते हैं, वह एक वृहत् दृष्टि-बिन्दु है। इस संग्रह में शामिल नाटक भी इसके अपवाद नहीं हैं। ‘लाक्षागृह’ में यदि वे महाभारत की एक घटना को आधार बनाकर मनुष्य की चिरन्तन प्रवृत्तियों की पड़ताल करते हैं तो, ‘संध्या की आरजू...’ के अपने पात्रों को आज के कॉरपोरेट तंत्र में स्थित करते हैं और इधर उभरी नई विडम्बनाओं पर प्रकाश डालते हैं। समय के इस बड़े अन्तराल के बीच ‘बम' की पृष्ठभूमि आज़़ादी के पहले का अविभाजित बंगाल है जिसमें हमें अरविन्द घोष मिलेंगे—ऋषि के रूप में नहीं, क्रन्तिकारी के रूप में...!
इसके अलावा इन नाटकों का सबसे बड़ा आकर्षण इनका भाषा-सौष्ठव और मंचीयता है जो इन्हें एक तरफ़ अभिनेय बनाती है तो दूसरी तरफ़ पठनीय भी। कथ्य स्वयं एक तत्त्व है जिसके लिए इन्हें पढ़ा ही जाना चाहिए। Bangla ke prakhyat natakkar aur rangkarmi vratya basu se hindi ke pathak aparichit nahin hain. Varshon pahle ‘chatushkon shirshak se unke char natkon ka sangrah hindi mein anudit hokar aa chuka hai, jise natak-premi pathkon ke sath-sath rangkarmiyon ne bhi bahut utsah ke saath svikar kiya. Is sangrah mein unke tin natak sanklit hain—‘lakshagrih’, ‘sandhya ki aarju mein bhor ka sarson phul’ aur ‘bam’ (boma). Vratya basu ka natakkar apne samay ko lakshit hota hai lekin jahan se ve apne vartman ko dekhte hain, vah ek vrihat drishti-bindu hai. Is sangrah mein shamil natak bhi iske apvad nahin hain. ‘lakshagrih’ mein yadi ve mahabharat ki ek ghatna ko aadhar banakar manushya ki chirantan prvrittiyon ki padtal karte hain to, ‘sandhya ki aarju. . . ’ ke apne patron ko aaj ke kaurporet tantr mein sthit karte hain aur idhar ubhri nai vidambnaon par prkash dalte hain. Samay ke is bade antral ke bich ‘bam ki prishthbhumi aazadi ke pahle ka avibhajit bangal hai jismen hamein arvind ghosh milenge—rishi ke rup mein nahin, krantikari ke rup mein. . . !
Iske alava in natkon ka sabse bada aakarshan inka bhasha-saushthav aur manchiyta hai jo inhen ek taraf abhiney banati hai to dusri taraf pathniy bhi. Kathya svayan ek tattv hai jiske liye inhen padha hi jana chahiye.

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