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Kuru-Kuru Swaha

Manohar Shyam Joshi

Rs. 250 Rs. 223

नाम बेढब, शैली बेडौल, कथानक बेपेंदे का। कुल मिलाकर बेजोड़ बकवास। अब यह पाठक पर है कि ‘बकवास’ को ‘एब्सर्ड’ का पर्याय माने या न माने। पहले शॉट से लेकर फ़ाइनल फ़्रीज तक यह एक कॉमेडी है, लेकिन इसी के एक पात्र के शब्दों में : “एइसा कॉमेडी कि दर्शिक... Read More

Description

नाम बेढब, शैली बेडौल, कथानक बेपेंदे का। कुल मिलाकर बेजोड़ बकवास। अब यह पाठक पर है कि ‘बकवास’ को ‘एब्सर्ड’ का पर्याय माने या न माने।
पहले शॉट से लेकर फ़ाइनल फ़्रीज तक यह एक कॉमेडी है, लेकिन इसी के एक पात्र के शब्दों में : “एइसा कॉमेडी कि दर्शिक लोग जानेगा, केतना हास्यास्पद है त्रास अउर केतना त्रासद है हास्य।”
उपन्यास का नायक है मनोहर श्याम जोशी, जो इस उपन्यास के लेखक मनोहर श्याम जोशी के अनुसार सर्वथा कल्पित पात्र है। यह नायक तिमंज़िला है। पहली मंज़िल में बसा है—मनोहर-श्रद्धालु-भावुक किशोर। दूसरी मंज़़िल में ‘जोशी जी’ नामक इंटेलेक्चुअल और तीसरी में दुनियादार श्रद्धालु ‘मैं’ जो इस कथा को सुना रहा है।
नायिका है पहुँचेली—एक अनाम और अबूझ पहेली, जो इस तिमंज़िला नायक को धराशायी करने के लिए ही अवतरित हुई है।
नायक-नायिका के चारों ओर है बम्बई का बुद्धिजीवी और अपराधजीवी जगत।
‘कुरु-कुरु स्वाहा’...में कई-कई कथानक होते हुए भी कोई कथानक नहीं है, भाषा और शिल्प के कई-कई तेवर होते हुए भी कोई तेवर नहीं है, आधुनिकता और परम्परा की तमाम अनुगूँजें होते हुए भी कहीं कोई वादी-संवादी स्वर नहीं है। यह एक ऐसा उपन्यास है, जो स्वयं को नकारता ही चला जाता है।
यह मज़ाक़ है, या तमाम मज़ाक़ों का मज़ाक़, इसका निर्णय हर पाठक अपनी श्रद्धा और अपनी मनःस्थिति के अनुसार करेगा।
बहुत ही सरल ढंग से जटिल और बहुत ही जटिल ढंग से सरल यह कथाकृति सुधी पाठकों के लिए विनोद, विस्मय और विवाद की पर्याप्त सामग्री जुटाएगी। Naam bedhab, shaili bedaul, kathanak bepende ka. Kul milakar bejod bakvas. Ab ye pathak par hai ki ‘bakvas’ ko ‘ebsard’ ka paryay mane ya na mane. Pahle shaut se lekar fainal frij tak ye ek kaumedi hai, lekin isi ke ek patr ke shabdon mein : “eisa kaumedi ki darshik log janega, ketna hasyaspad hai tras aur ketna trasad hai hasya. ”
Upanyas ka nayak hai manohar shyam joshi, jo is upanyas ke lekhak manohar shyam joshi ke anusar sarvtha kalpit patr hai. Ye nayak timanzila hai. Pahli manzil mein basa hai—manohar-shraddhalu-bhavuk kishor. Dusri manzil mein ‘joshi ji’ namak intelekchual aur tisri mein duniyadar shraddhalu ‘main’ jo is katha ko suna raha hai.
Nayika hai pahuncheli—ek anam aur abujh paheli, jo is timanzila nayak ko dharashayi karne ke liye hi avatrit hui hai.
Nayak-nayika ke charon or hai bambii ka buddhijivi aur apradhjivi jagat.
‘kuru-kuru svaha’. . . Mein kai-kai kathanak hote hue bhi koi kathanak nahin hai, bhasha aur shilp ke kai-kai tevar hote hue bhi koi tevar nahin hai, aadhunikta aur parampra ki tamam anugunjen hote hue bhi kahin koi vadi-sanvadi svar nahin hai. Ye ek aisa upanyas hai, jo svayan ko nakarta hi chala jata hai.
Ye mazaq hai, ya tamam mazaqon ka mazaq, iska nirnay har pathak apni shraddha aur apni manःsthiti ke anusar karega.
Bahut hi saral dhang se jatil aur bahut hi jatil dhang se saral ye kathakriti sudhi pathkon ke liye vinod, vismay aur vivad ki paryapt samagri jutayegi.