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Kullibhat

Suryakant Tripathi 'Nirala'

Rs. 160 Rs. 142

‘कुल्ली भाट’ अपनी कथा-वस्तु और शैली-शिल्प के नएपन के कारण न केवल निराला के गद्य-साहित्य की बल्कि हिन्दी के सम्पूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह... Read More

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Description

‘कुल्ली भाट’ अपनी कथा-वस्तु और शैली-शिल्प के नएपन के कारण न केवल निराला के गद्य-साहित्य की बल्कि हिन्दी के सम्पूर्ण गद्य-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है।
यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने इसमें निराला का अपना सामाजिक जीवन मुखर हुआ है और बहुलांश में यह महाकवि की आत्मकथा ही है। यही कारण है कि सन् 1939 के मध्य में प्रकाशित यह कृति उस समय की प्रगतिशील धारा के अग्रणी साहित्यकारों के लिए चुनौती के रूप में सामने आई, तो देशोद्धार का राग अलापनेवाले राजनीतिज्ञों के लिए इसने आईने का काम किया।
संक्षेप में कहें तो निराला के विद्रोही तेवर और ग़लत सामाजिक मान्यताओं पर उनके तीखे प्रहारों ने इस छोटी-सी कृति को महाकाव्यात्मक विस्तार दे दिया है, जिसे पढ़ना एक विराट जीवन-अनुभव से गुज़रना है। ‘kulli bhat’ apni katha-vastu aur shaili-shilp ke nepan ke karan na keval nirala ke gadya-sahitya ki balki hindi ke sampurn gadya-sahitya ki ek vishisht uplabdhi hai. Ye isaliye bhi mahattvpurn hai ki kulli ke jivan-sangharsh ke bahane ismen nirala ka apna samajik jivan mukhar hua hai aur bahulansh mein ye mahakavi ki aatmaktha hi hai. Yahi karan hai ki san 1939 ke madhya mein prkashit ye kriti us samay ki pragatishil dhara ke agrni sahitykaron ke liye chunauti ke rup mein samne aai, to deshoddhar ka raag alapnevale rajnitigyon ke liye isne aaine ka kaam kiya.
Sankshep mein kahen to nirala ke vidrohi tevar aur galat samajik manytaon par unke tikhe prharon ne is chhoti-si kriti ko mahakavyatmak vistar de diya hai, jise padhna ek virat jivan-anubhav se guzarna hai.