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Kosambi : Kalpana Se Yatharth Tak

Rs. 600 Rs. 534

भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में दामोदर धर्मानन्द कोसंबी को मार्क्सवादी इतिहास का जनक माना जाता है, लेकिन यह विडम्बना ही है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों तक ने उन पर ऐसा ठोस काम अभी तक नहीं किया है, जिससे कोसंबी को समझना आसान हो सके, और जो उनके अध्ययन की दिशाओं में... Read More

Description

भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में दामोदर धर्मानन्द कोसंबी को मार्क्सवादी इतिहास का जनक माना जाता है, लेकिन यह विडम्बना ही है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों तक ने उन पर ऐसा ठोस काम अभी तक नहीं किया है, जिससे कोसंबी को समझना आसान हो सके, और जो उनके अध्ययन की दिशाओं में आगे कुछ जोड़ सके। कोसंबी के अन्तर्विरोधों को रेखांकित करने और उनके पीछे निहित कारणों को जानने की कोशिश लगभग नहीं ही हुई है।
प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक भगवान सिंह की यह पुस्तक इस अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण आरम्भ है। इसमें उन्होंने न सिर्फ़ कोसंबी की मौलिक उद्भावनाओं और स्थापनाओं पर विस्तार से विचार किया है, बल्कि उनकी प्रतिपादन-पद्धति का भी विश्लेषण किया है। साथ ही व्यक्ति कोसंबी और एक विलक्षण प्रतिभा के रूप में बनी उनकी 'मूरत' को भी समझने की कोशिश की है। कोसंबी के नाम-जाप से ही अपनी उपलब्धियों का आकाश छूनेवाले इतिहासकारों के विपरीत भगवान सिंह ने इस सुचिन्तित अध्ययन में उनके अन्तर्विरोधों को भी रेखांकित किया है। आमुख में वे लिखते हैं, ‘हमारा अपना प्रयत्न कोसंबी को समझने का रहा है, परन्तु जहाँ वे अपने ही सिद्धान्त के विपरीत आचरण करते दिखाई देते हैं या अपनी सैद्धान्तिकी के विपरीत दावे करते हैं...वहाँ उनकी निन्दा के लिए भी बाध्य हुए हैं।’
कहना न होगा कि यह पुस्तक इतिहासवेत्ता कोसंबी को समझने में इतिहास के विद्वानों और अध्येताओं के लिए बहस के नए बिन्दु प्रस्तावित करेगी। Bhartiy itihas ke sandarbh mein damodar dharmanand kosambi ko marksvadi itihas ka janak mana jata hai, lekin ye vidambna hi hai ki marksvadi itihaskaron tak ne un par aisa thos kaam abhi tak nahin kiya hai, jisse kosambi ko samajhna aasan ho sake, aur jo unke adhyyan ki dishaon mein aage kuchh jod sake. Kosambi ke antarvirodhon ko rekhankit karne aur unke pichhe nihit karnon ko janne ki koshish lagbhag nahin hi hui hai. Prsiddh itihaskar aur lekhak bhagvan sinh ki ye pustak is arth mein ek mahattvpurn aarambh hai. Ismen unhonne na sirf kosambi ki maulik udbhavnaon aur sthapnaon par vistar se vichar kiya hai, balki unki pratipadan-paddhati ka bhi vishleshan kiya hai. Saath hi vyakti kosambi aur ek vilakshan pratibha ke rup mein bani unki murat ko bhi samajhne ki koshish ki hai. Kosambi ke nam-jap se hi apni uplabdhiyon ka aakash chhunevale itihaskaron ke viprit bhagvan sinh ne is suchintit adhyyan mein unke antarvirodhon ko bhi rekhankit kiya hai. Aamukh mein ve likhte hain, ‘hamara apna pryatn kosambi ko samajhne ka raha hai, parantu jahan ve apne hi siddhant ke viprit aachran karte dikhai dete hain ya apni saiddhantiki ke viprit dave karte hain. . . Vahan unki ninda ke liye bhi badhya hue hain. ’
Kahna na hoga ki ye pustak itihasvetta kosambi ko samajhne mein itihas ke vidvanon aur adhyetaon ke liye bahas ke ne bindu prastavit karegi.