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KODKU DANA | STORIES | कोड़कू दाना (कहानी संग्रह)
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इस पुस्तक को लिखते हुए मैंने एक ही बात बार-बार महसूस की, कि दुनिया में अस्तित्व का 'होना' और 'स्वीकार' किया जाना, दो बिलकुल अलग अनुभव हैं। मैं उन पात्रों, अनुभवों, स्मृतियों और छायाओं के पास लंबे समय तक बैठी, जिन्हें समाज ने अक्सर अनुपयोगी, अनमेल, असुविधाजनक या बोझ कहकर किनारे कर दिया। मेरी दृष्टि में वे सब 'कोड़कू दाने' नहीं थे, लेकिन उनकी परिस्थितियाँ उन्हें अनजाने में वैसी पहचान दे गईं। और सच कहूँ तो, अनचाहा होना स्वयं में कितना दुर्भाग्यपूर्ण है, यही इस संग्रह का मूल भाव बन गया। मैंने इस पुस्तक में उन स्त्रियों की नीरव भाषा सुनी, जो घरों में रहीं, पर मन में स्थान नहीं पा सकीं। उन्हें प्रेम से अधिक कर्तव्य और चिंता की परिभाषाएँ मिलीं। इस किताब को लिखते हुए मैंने उन बच्चों की आँखों में भी झाँका, जिनके मन की भाषा समाज आज तक पढ़ नहीं सका। वे बच्चे जो केवल पालन-पोषण नहीं, समझे जाने की प्रतीक्षा करते हैं, पर बड़े लोग उनकी चुप्पियों को आलस्य, उनकी जिज्ञासाओं को उद्दंडता, और उनके संकोच को अक्षमता मान लेते हैं। समाज को बच्चों का मन गढ़ने में तो रुचि है, पर मन समझने में नहीं। उन्हें सिखाया जाता है कैसे सफल दिखना है पर फूल-सा मन कभी-कभी समाज के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है। इस संग्रह में कुछ कहानियाँ उन रिश्तों और जुड़ावों के ईद-गिर्द घूमती हैं, जो इरादतन नहीं, बल्कि अचानक बनते हैं। अनचाहे मिलन, आकस्मिक स्पर्श, क्षणिक स्नेह या भावावेश से उपजे। ऐसे रिश्तों को बाद में अक्सर नकार दिया जाता है, लेकिन वे ख़त्म नहीं होते हैं, वे स्मृति, अपराध-बोध, मौन और अनिश्चितता की तहों में जीते रहते हैं। बिल्कुल उन गमलों में उग आने वाली घास की तरह जो फूल बनने की इच्छा नहीं रखती, पर उपस्थित होने मात्र से अस्वीकार कर दी जाती है। मिटा दी जाती है, पर फिर उग आने की संभावना नहीं छोड़ती। इस प्रतीक में मैंने मानव अस्तित्व का सबसे सचेत, सबसे निष्पक्ष रूप देखा। 'कोड़कू दाना' मेरे लिए निराशा का शब्द नहीं है। यह स्वीकृति की माँग भी नहीं है। यह उन जीवन-अनुभवों का साहित्यिक दस्तावेज़ है, जिन्हें संसार महत्वहीन कहकर आगे बढ़ जाता है। — नीना अंदौत्रा
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