BackBack
-11%

Khamosh Nange Hamam Mein Hain

Rs. 250 Rs. 223

परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी और श्रीलाल शुक्ल की पीढ़ी के बाद यदि हिन्दी-विश्‍व को कोई एक व्यंग्यकार सर्वाधिक आश्वस्त करता है तो वह ज्ञान चतुर्वेदी हैं। वे क्या ‘नया लिख रहे हैं’—इसको लेकर जितनी उत्सुकता उनके पाठकों को रहती है, उतनी ही आलोचकों को भी। विशेष तौर पर, राजकमल... Read More

BlackBlack
Description

परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी और श्रीलाल शुक्ल की पीढ़ी के बाद यदि हिन्दी-विश्‍व को कोई एक व्यंग्यकार सर्वाधिक आश्वस्त करता है तो वह ज्ञान चतुर्वेदी हैं। वे क्या ‘नया लिख रहे हैं’—इसको लेकर जितनी उत्सुकता उनके पाठकों को रहती है, उतनी ही आलोचकों को भी। विशेष तौर पर, राजकमल द्वारा ही प्रकाशित अपने दो उपन्यासों—‘नरक यात्रा’ और ‘बारामासी’ के बाद तो ज्ञान चतुर्वेदी इस पीढ़ी के व्यंग्यकारों के बीच सर्वाधिक पठनीय, प्रतिभावान, लीक तोड़नेवाले और हिन्दी-व्यंग्य को वहाँ से नई ऊँचाइयों पर ले जानेवाले माने जा रहे हैं, जहाँ परसाई ने उसे पहुँचाया था।
ज्ञान चतुर्वेदी में परसाई जैसा प्रखर चिन्तन, शरद जोशी जैसा विट, त्यागी जैसी हास्य-क्षमता तथा श्रीलाल शुक्ल जैसी विलक्षण भाषा का अद्भुत मेल है, जो उन्हें हिन्दी-व्यंग्य के इतिहास में अलग ही खड़ा करता है। ज्ञान को आप जितना पढ़ते हैं, उतना ही उनके लेखन के विषय-वैविध्य, शैली की प्रयोगधर्मिता और भाषा की धूप-छाँव से चमत्कृत होते हैं। वे जितने सहज कौशल से छोटी-छोटी व्‍यंग्‍य-कथाएँ और व्‍यंग्‍य-टिप्‍पणियाँ रचते हैं, उतने ही जतन से लम्बी व्‍यंग्‍य रचनाएँ भी बुनते हैं। ‘नरक यात्रा’ और ‘बारामासी’ जैसे बड़े उपन्‍यासों में उनके व्यंग्य-तेवर देखते ही बनते हैं। ज्ञान चतुर्वेदी विशुद्ध व्यंग्य लिखने में उतने ही सिद्धहस्त हैं, जितना ‘निर्मल हास्य’ रचने में।
वास्तव में ज्ञान की रचनाओं में हास्य और व्यंग्य का ऐसा नपा-तुला तालमेल मिलता है, जहाँ ‘दोनों ही’ एक-दूसरे की ताक़त बन जाते हैं। और तब हिन्दी की यह ‘बहस’ ज्ञान को पढ़ते हुए बड़ी बेमानी मालूम होने लगती है कि हास्य के (तथाकथित) घालमेल से व्यंग्य का पैनापन कितना कम हो जाता है? सही मायनों में तो ज्ञान चतुर्वेदी के लेखन से गुज़रना एक ‘सम्पूर्ण व्यंग्य-रचना’ के तेवरों से परिचय पाने के अद्वितीय अनुभव से गुज़रना है। Parsai, sharad joshi, ravindrnath tyagi aur shrilal shukl ki pidhi ke baad yadi hindi-vish‍va ko koi ek vyangykar sarvadhik aashvast karta hai to vah gyan chaturvedi hain. Ve kya ‘naya likh rahe hain’—isko lekar jitni utsukta unke pathkon ko rahti hai, utni hi aalochkon ko bhi. Vishesh taur par, rajakmal dvara hi prkashit apne do upanyason—‘narak yatra’ aur ‘baramasi’ ke baad to gyan chaturvedi is pidhi ke vyangykaron ke bich sarvadhik pathniy, pratibhavan, lik todnevale aur hindi-vyangya ko vahan se nai uunchaiyon par le janevale mane ja rahe hain, jahan parsai ne use pahunchaya tha. Gyan chaturvedi mein parsai jaisa prkhar chintan, sharad joshi jaisa vit, tyagi jaisi hasya-kshamta tatha shrilal shukl jaisi vilakshan bhasha ka adbhut mel hai, jo unhen hindi-vyangya ke itihas mein alag hi khada karta hai. Gyan ko aap jitna padhte hain, utna hi unke lekhan ke vishay-vaividhya, shaili ki pryogdharmita aur bhasha ki dhup-chhanv se chamatkrit hote hain. Ve jitne sahaj kaushal se chhoti-chhoti ‍yang‍ya-kathayen aur ‍yang‍ya-tip‍paniyan rachte hain, utne hi jatan se lambi ‍yang‍ya rachnayen bhi bunte hain. ‘narak yatra’ aur ‘baramasi’ jaise bade upan‍yason mein unke vyangya-tevar dekhte hi bante hain. Gyan chaturvedi vishuddh vyangya likhne mein utne hi siddhhast hain, jitna ‘nirmal hasya’ rachne mein.
Vastav mein gyan ki rachnaon mein hasya aur vyangya ka aisa napa-tula talmel milta hai, jahan ‘donon hi’ ek-dusre ki taqat ban jate hain. Aur tab hindi ki ye ‘bahas’ gyan ko padhte hue badi bemani malum hone lagti hai ki hasya ke (tathakthit) ghalmel se vyangya ka painapan kitna kam ho jata hai? sahi maynon mein to gyan chaturvedi ke lekhan se guzarna ek ‘sampurn vyangya-rachna’ ke tevron se parichay pane ke advitiy anubhav se guzarna hai.