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Khadan Se Khwabon Tak : Sangmarmar

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पत्थर न केवल बोलते हैं, वरन् ख़ूब मीठा बोलते हैं। यही नहीं, पत्थर मनुष्य से ज़्यादा धैर्यवान व सहनशील हैं। पत्थरों का बाह्य आवरण जितना सख़्त व निर्मम है, उनका अन्तर्मन उतना ही कोमल व उदार है। बिलकुल श्रीफल की तरह। परिस्थितियों के साथ बदलने में तो पत्थरों का कोई... Read More

Description

पत्थर न केवल बोलते हैं, वरन् ख़ूब मीठा बोलते हैं। यही नहीं, पत्थर मनुष्य से ज़्यादा धैर्यवान व सहनशील हैं। पत्थरों का बाह्य आवरण जितना सख़्त व निर्मम है, उनका अन्तर्मन उतना ही कोमल व उदार है। बिलकुल श्रीफल की तरह।
परिस्थितियों के साथ बदलने में तो पत्थरों का कोई सानी ही नहीं है। हाँ, वे ज़रूरत से ज़्यादा स्वाभिमानी और स्वावलम्बी हैं, अत: उन्हें सावधानी व मज़बूती से भू-गर्भ से निकालना व सँवारना पड़ता है।
पत्थर आसानी से अपना रंगरूप नहीं बदलते, पर एक बार जो बदलाव स्वीकार कर लेते हैं, उसे स्थायी रूप से आत्मसात् कर लेते हैं। हम सबने देखा है कि पत्थर जब किसी भवन की नींव बनते हैं तो सहस्रों साल के लिए स्थितप्रज्ञ (समाधि में लीन) हो जाते हैं। पत्थर अत्यन्त मज़बूत व मेहनती हैं और दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षा करते हैं।
याद करें, पाषाण युग। दस हज़ार साल पहले मनुष्य पशुवत् जीवन जी रहा था। पत्थरों ने ही उसे सलीक़े से जीने व ज़िन्दा रहने के लिए संघर्ष करना सिखाया। यही नहीं, पत्थर ही मनुष्य के पहले मित्र-परिजन व शुभचिन्तक बने। पत्थरों ने मनुष्य को हथियार बनकर सुरक्षा प्रदान की। पत्थरों की मदद से शिकार करके ही मनुष्य ने अपना पेट भरा। आभूषण बन पत्थरों ने मनुष्य को सजाया व सँवारा। फ़र्श व छत बन उन्हें प्रकृति के प्रकोप से बचाया। पत्थरों ने ही मानव समुदाय को वैभव व कीर्ति प्रदान की है। वस्तुत: पत्थर ही वह नींव (बुनियाद) हैं, जिन पर क़दमताल करते हुए मनुष्य सभ्य हुआ और आज आकाश में उड़ान भर रहा है। पत्थरों की धरती माँ की कोख में प्रसव पीड़ा से उनके हम तक पहुँचने की दिलचस्प कहानी है यह पुस्तक। Patthar na keval bolte hain, varan khub mitha bolte hain. Yahi nahin, patthar manushya se zyada dhairyvan va sahanshil hain. Patthron ka bahya aavran jitna sakht va nirmam hai, unka antarman utna hi komal va udar hai. Bilkul shriphal ki tarah. Paristhitiyon ke saath badalne mein to patthron ka koi sani hi nahin hai. Han, ve zarurat se zyada svabhimani aur svavlambi hain, at: unhen savdhani va mazbuti se bhu-garbh se nikalna va sanvarana padta hai.
Patthar aasani se apna rangrup nahin badalte, par ek baar jo badlav svikar kar lete hain, use sthayi rup se aatmsat kar lete hain. Hum sabne dekha hai ki patthar jab kisi bhavan ki ninv bante hain to sahasron saal ke liye sthitapragya (samadhi mein lin) ho jate hain. Patthar atyant mazbut va mehanti hain aur dusron se bhi aisi hi apeksha karte hain.
Yaad karen, pashan yug. Das hazar saal pahle manushya pashuvat jivan ji raha tha. Patthron ne hi use saliqe se jine va zinda rahne ke liye sangharsh karna sikhaya. Yahi nahin, patthar hi manushya ke pahle mitr-parijan va shubhchintak bane. Patthron ne manushya ko hathiyar bankar suraksha prdan ki. Patthron ki madad se shikar karke hi manushya ne apna pet bhara. Aabhushan ban patthron ne manushya ko sajaya va sanvara. Farsh va chhat ban unhen prkriti ke prkop se bachaya. Patthron ne hi manav samuday ko vaibhav va kirti prdan ki hai. Vastut: patthar hi vah ninv (buniyad) hain, jin par qadamtal karte hue manushya sabhya hua aur aaj aakash mein udan bhar raha hai. Patthron ki dharti man ki kokh mein prsav pida se unke hum tak pahunchane ki dilchasp kahani hai ye pustak.