BackBack
-11%

Kala Pahar

Rs. 395 Rs. 352

उपन्यास का काम समकालीन यथार्थ के प्रतिनिधित्व के माध्यम से अतीत को पुनर्जीवित और भविष्य के मिज़ाज को रेखांकित करना है। भगवान मोरवाल के ‘काला पहाड़’ में ये विशिष्टताएँ हैं। ‘काला पहाड़’ के पात्रों की कर्मभूमि ‘मेवात क्षेत्र’ है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की सीमाओं में विस्तृत यह वह क्षेत्र... Read More

BlackBlack
Description

उपन्यास का काम समकालीन यथार्थ के प्रतिनिधित्व के माध्यम से अतीत को पुनर्जीवित और भविष्य के मिज़ाज को रेखांकित करना है। भगवान मोरवाल के ‘काला पहाड़’ में ये विशिष्टताएँ हैं। ‘काला पहाड़’ के पात्रों की कर्मभूमि ‘मेवात क्षेत्र’ है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की सीमाओं में विस्तृत यह वह क्षेत्र है, जिसने मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर से टक्कर ली थी और जिसने भारत की ‘मिलीजुली तहज़ीब’ को आज तक सुरक्षित रखा है।
‘काला पहाड़’ एक उपन्यास का शीर्षक नहीं है, वरन् मेवात की भौगोलिक-सांस्कृतिक अस्मिता और समूचे देश में व्याप्त बहुआयामी विसंगतिपूर्ण प्रक्रिया का प्रतीक है। इसके पात्र—सलेमी, मनीराम, रोबड़ा, हरसाय, सुलेमान, छोटेलाल, बाबू ख़ाँ, सुभान ख़ाँ, रुमाली, अंगूरी, रोमदेई, तरकीला, मेमन, चौधरी करीम हुसैन व चौधरी मुर्शीद अहमद आदि ठेठ देहाती हिन्दुस्तान की कहानी कहते हैं। मेवात के ये अकिंचन पात्र अपने में वे सभी अनुभव, त्रासदी, ख़ुशियाँ समेटे हुए हैं, जो किसी दूरदराज़ अनजाने हिन्दुस्तानी की भी जीवन-पूँजी हो सकते हैं।
लेखक जहाँ ऐतिहासिक पात्र व मेवात-नायक ‘हसन ख़ाँ मेवाती’ की ओर आकृष्ट है, वहीं वह अयोध्या-त्रासदी की परछाइयों को भी समेटता है, इस त्रासदी में झुलसनेवाली बहुलतावादी संस्कृति को रचनात्मक अभिव्यक्ति देता है। उपन्यास की विशेषता यह है कि इसने समाज के हाशिए के लोगों को अपने कथा-फ़लक पर उन्मुक्त भूमिका निभाने की छूट दी है। मोरवाल की पृष्ठभूमि दलित ज़रूर है लेकिन किरदारों के ‘ट्रीटमेंट’ में वह दलित ग्रन्थि से अछूते हैं। Upanyas ka kaam samkalin yatharth ke pratinidhitv ke madhyam se atit ko punarjivit aur bhavishya ke mizaj ko rekhankit karna hai. Bhagvan morval ke ‘kala pahad’ mein ye vishishttayen hain. ‘kala pahad’ ke patron ki karmbhumi ‘mevat kshetr’ hai. Hariyana, rajasthan, uttar prdesh ki simaon mein vistrit ye vah kshetr hai, jisne mugal samrajya ke sansthapak babar se takkar li thi aur jisne bharat ki ‘milijuli tahzib’ ko aaj tak surakshit rakha hai. ‘kala pahad’ ek upanyas ka shirshak nahin hai, varan mevat ki bhaugolik-sanskritik asmita aur samuche desh mein vyapt bahuayami visangatipurn prakriya ka prtik hai. Iske patr—salemi, maniram, robda, harsay, suleman, chhotelal, babu khan, subhan khan, rumali, anguri, romdei, tarkila, meman, chaudhri karim husain va chaudhri murshid ahmad aadi theth dehati hindustan ki kahani kahte hain. Mevat ke ye akinchan patr apne mein ve sabhi anubhav, trasdi, khushiyan samete hue hain, jo kisi duradraz anjane hindustani ki bhi jivan-punji ho sakte hain.
Lekhak jahan aitihasik patr va mevat-nayak ‘hasan khan mevati’ ki or aakrisht hai, vahin vah ayodhya-trasdi ki parchhaiyon ko bhi sametta hai, is trasdi mein jhulasnevali bahultavadi sanskriti ko rachnatmak abhivyakti deta hai. Upanyas ki visheshta ye hai ki isne samaj ke hashiye ke logon ko apne katha-falak par unmukt bhumika nibhane ki chhut di hai. Morval ki prishthbhumi dalit zarur hai lekin kirdaron ke ‘tritment’ mein vah dalit granthi se achhute hain.