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Kajar Ki Kothari

Rs. 99

‘काजर की कोठरी ‘चन्द्रकान्ता’ और ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’—जैसी कालजयी उपन्यासमाला के महान लेखक बाबू देवकीनन्दन खत्री का एक और महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। दूसरे शब्दों में, एक बड़े ज़मींदार लालसिंह की अकूत दौलत को हड़पने की साज़िश और साथ ही उसे निष्फल करने के प्रयासों की अत्यन्त दिलचस्प दास्तान। लालसिंह ने अपनी... Read More

Description

‘काजर की कोठरी ‘चन्द्रकान्ता’ और ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’—जैसी कालजयी उपन्यासमाला के महान लेखक बाबू देवकीनन्दन खत्री का एक और महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। दूसरे शब्दों में, एक बड़े ज़मींदार लालसिंह की अकूत दौलत को हड़पने की साज़िश और साथ ही उसे निष्फल करने के प्रयासों की अत्यन्त दिलचस्प दास्तान।
लालसिंह ने अपनी तमाम दौलत को एक सशर्त वसीयतनामे के द्वारा अपनी इकलौती बेटी सरला के नाम कर दिया है। यही कारण है कि शादी के ऐन वक़्त लालसिंह के दुष्ट भतीजे सरला को ही उड़ा ले जाते हैं और उसे क़ैद कर लेते हैं। साथ ही वे सरला के मंगेतर हरनन्दन बाबू के चरित्र-हनन की भी कोशिश में लग जाते हैं, और इनकी उन तमाम साज़िशों में शरीक है बांदी नामक एक अद्भुत वेश्या। लेकिन उसका मुक़ाबला करती है एक और ‘वेश्या’ सुलतानी। वास्तव में यह समूचा घटनाक्रम अनेक विचित्रताओं से भरा होकर भी अत्यन्त वास्तविक है, जिसके पीछे लेखक की एक सुसंगत तार्किक दृष्टि है।
इस रचना के माध्यम से जहाँ लेखक ने धनपतियों के बीच वेश्याओं की कूटनीतिक भूमिका को दर्शाया है, वहीं पूँजी के बुनियादी चरित्र—उसकी मानवता-विरोधी भूमिका—को भी उजागर किया है। ‘kajar ki kothri ‘chandrkanta’ aur ‘chandrkanta santati’—jaisi kalajyi upanyasmala ke mahan lekhak babu devkinandan khatri ka ek aur mahattvpurn upanyas hai. Dusre shabdon mein, ek bade zamindar lalsinh ki akut daulat ko hadapne ki sazish aur saath hi use nishphal karne ke pryason ki atyant dilchasp dastan. Lalsinh ne apni tamam daulat ko ek sashart vasiyatname ke dvara apni iklauti beti sarla ke naam kar diya hai. Yahi karan hai ki shadi ke ain vaqt lalsinh ke dusht bhatije sarla ko hi uda le jate hain aur use qaid kar lete hain. Saath hi ve sarla ke mangetar harnandan babu ke charitr-hanan ki bhi koshish mein lag jate hain, aur inki un tamam sazishon mein sharik hai bandi namak ek adbhut veshya. Lekin uska muqabla karti hai ek aur ‘veshya’ sultani. Vastav mein ye samucha ghatnakram anek vichitrtaon se bhara hokar bhi atyant vastvik hai, jiske pichhe lekhak ki ek susangat tarkik drishti hai.
Is rachna ke madhyam se jahan lekhak ne dhanapatiyon ke bich veshyaon ki kutnitik bhumika ko darshaya hai, vahin punji ke buniyadi charitr—uski manavta-virodhi bhumika—ko bhi ujagar kiya hai.