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Kahi Na Jay Ka Kahie

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“मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि मरने के बाद मेरा नाम ही रह जाएगा। यह नाम भी कब तक रहता है, कुछ कहा नहीं जा सकता। और नाम का रहना या न रहना मेरे लिए महत्त्व का नहीं है। लेकिन अपना नाम सैकड़ों-हज़ारों वर्ष चले, इसकी अभिलाषा अपनी इस... Read More

Description

“मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि मरने के बाद मेरा नाम ही रह जाएगा। यह नाम भी कब तक रहता है, कुछ कहा नहीं जा सकता। और नाम का रहना या न रहना मेरे लिए महत्त्व का नहीं है। लेकिन अपना नाम सैकड़ों-हज़ारों वर्ष चले, इसकी अभिलाषा अपनी इस लापरवाही वाली अकड़ के बावजूद, मन के किसी कोने में जब-तब उचक-उचक पड़ती है।
“तो मैं भगवतीचरण वर्मा, पुत्र श्री देवीचरण, जाति कायस्थ, रहनेवाला फ़िलहाल लखनऊ का, अपनी आत्मकथा कह रहा हूँ। कुछ हिचकिचाहट होती है, कुछ हँसी आती है—बेर-बेर एक पंक्ति गुनगुना लेता हूँ—‘कहि न जाय का कहिए।’ तो यह आत्मकथा मैं दूसरों पर अपने को आरोपित करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं तो यह दूसरों का मनोरंजन करने के लिए कह रहा हूँ।”
लेकिन दुर्भाग्य से यह आत्मकथा पूरी न हो सकी। अगर पूरी हो गई होती तो निश्चय ही यह हिन्दी में एक महत्त्वपूर्ण आत्मकथा होती। ‘चित्रलेखा’, ‘भूले-बिसरे चित्र’, ‘रेखा’, ‘सबहिं नचावत राम गोसाईं’ जैसे उपन्यासों के रचनाकार भगवती बाबू ही यह कह सकते थे कि अपनी आत्मकथा वे दूसरों के मनोरंजन के लिए कह रहे हैं।
इस अधूरी आत्मकथा को किसी हद तक पूरा करने के लिए उनका तीन किश्तों में लिखा एक आत्मकथ्य ‘ददुआ हम पै बिपदा तीन’ भी इस पुस्तक में दिया जा रहा है। इसमें पाठकों को अपने प्रिय लेखक को समझने के लिए और व्यापक आधार मिलेगा। “main ye achchhi tarah janta hun ki marne ke baad mera naam hi rah jayega. Ye naam bhi kab tak rahta hai, kuchh kaha nahin ja sakta. Aur naam ka rahna ya na rahna mere liye mahattv ka nahin hai. Lekin apna naam saikdon-hazaron varsh chale, iski abhilasha apni is laparvahi vali akad ke bavjud, man ke kisi kone mein jab-tab uchak-uchak padti hai. “to main bhagavtichran varma, putr shri devichran, jati kayasth, rahnevala filhal lakhanuu ka, apni aatmaktha kah raha hun. Kuchh hichakichahat hoti hai, kuchh hansi aati hai—ber-ber ek pankti gunaguna leta hun—‘kahi na jaay ka kahiye. ’ to ye aatmaktha main dusron par apne ko aaropit karne ke liye nahin kah raha hun. Main to ye dusron ka manoranjan karne ke liye kah raha hun. ”
Lekin durbhagya se ye aatmaktha puri na ho saki. Agar puri ho gai hoti to nishchay hi ye hindi mein ek mahattvpurn aatmaktha hoti. ‘chitrlekha’, ‘bhule-bisre chitr’, ‘rekha’, ‘sabahin nachavat raam gosain’ jaise upanyason ke rachnakar bhagavti babu hi ye kah sakte the ki apni aatmaktha ve dusron ke manoranjan ke liye kah rahe hain.
Is adhuri aatmaktha ko kisi had tak pura karne ke liye unka tin kishton mein likha ek aatmkathya ‘dadua hum pai bipda tin’ bhi is pustak mein diya ja raha hai. Ismen pathkon ko apne priy lekhak ko samajhne ke liye aur vyapak aadhar milega.