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Kahaniyan Rishton Ki : Bade Bujurg

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बड़े-बुज़़ुर्ग कहते ही कुछ ऐसा लगता है जैसे जीवन की मुख्यधारा से चुपचाप किनारे होता कोई व्यक्ति। लेकिन उम्र का चढ़ते जाना जीवन के अन्त की कातर प्रतीक्षा में बदलना नहीं है। व्यक्ति की लालसाएँ और प्रतीक्षाएँ तो नित नई हमेशा रहती हैं। बुज़ुर्गों को अक्सर अपने पुराने दिनों से... Read More

Description

बड़े-बुज़़ुर्ग कहते ही कुछ ऐसा लगता है जैसे जीवन की मुख्यधारा से चुपचाप किनारे होता कोई व्यक्ति। लेकिन उम्र का चढ़ते जाना जीवन के अन्त की कातर प्रतीक्षा में बदलना नहीं है। व्यक्ति की लालसाएँ और प्रतीक्षाएँ तो नित नई हमेशा रहती हैं। बुज़ुर्गों को अक्सर अपने पुराने दिनों से भी एक लड़ाई लड़नी पड़ती है। अपनी आदतों से, दूसरों की अपेक्षाओं से और सबसे ज़्यादा अपनी कमज़ोर पड़ती सामर्थ्य और हैसियत से। लेकिन यह जीवन का सत्य है। इसका साक्षात्कार इस दस्तावेज़ी संकलन की कहानियों में संवेदनात्मक स्तर पर होगा जिससे पाठक बड़े-बुज़ुर्गों के प्रति अपने भीतर एक अलग तरह की कोमलता का अनुभव करेगा। Bade-buzurg kahte hi kuchh aisa lagta hai jaise jivan ki mukhydhara se chupchap kinare hota koi vyakti. Lekin umr ka chadhte jana jivan ke ant ki katar prtiksha mein badalna nahin hai. Vyakti ki lalsayen aur prtikshayen to nit nai hamesha rahti hain. Buzurgon ko aksar apne purane dinon se bhi ek ladai ladni padti hai. Apni aadton se, dusron ki apekshaon se aur sabse zyada apni kamzor padti samarthya aur haisiyat se. Lekin ye jivan ka satya hai. Iska sakshatkar is dastavezi sanklan ki kahaniyon mein sanvednatmak star par hoga jisse pathak bade-buzurgon ke prati apne bhitar ek alag tarah ki komalta ka anubhav karega.