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Kabristan Mein Panchayat

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‘कब्रिस्तान में पंचायत’ कवि केदारनाथ सिंह की एक गद्य कृति है—एक कवि के गद्य का एक विलक्षण नमूना—जिसमें उसकी सोच, अनुभव और उसके पूरे परिवेश की कुछ मार्मिक छवियाँ मिलेंगी और बेशक वे चिन्ताएँ भी जो सिर्फ़ एक लेखक की नहीं हैं। पुस्तक के नाम में जो व्यंग्यार्थ है, वह... Read More

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Description

‘कब्रिस्तान में पंचायत’ कवि केदारनाथ सिंह की एक गद्य कृति है—एक कवि के गद्य का एक विलक्षण नमूना—जिसमें उसकी सोच, अनुभव और उसके पूरे परिवेश की कुछ मार्मिक छवियाँ मिलेंगी और बेशक वे चिन्ताएँ भी जो सिर्फ़ एक लेखक की नहीं हैं। पुस्तक के नाम में जो व्यंग्यार्थ है, वह हमारे समय के गहरे उद्वेलन की ओर संकेत करता है और शायद इस बात की ओर भी कि इस अबोलेपन की हद तक बँटे हुए समय में परस्पर बातचीत के सिवा कोई रास्ता नहीं। यह अबोलापन इतना गहरा है और इतनी दूर तक फैला हुआ कि आज एक माँ और ‘उसके द्वारा रची गई उसकी अपनी ही सृष्टि’ के बीच एक लम्बी फाँक आ गई है। इस पुस्तक के ज़्यादातर आलेख इन्हीं फाँकों या दरारों के बोध से पैदा हुए हैं—फिर वह अक्का महादेवी की पीड़ा-भरी चुनौती हो या एक रहस्यमय दर्द से एक मामूली आदमी का मर जाना।
इन आलेखों में एक सुखद विविधता मिलेगी, जिसका फलक एक ओर वाक्यपदीयम् से कोलकाता की सड़क पर पड़ी घायल चिड़िया तक फैला है और दूसरी ओर विस्मृत दलित कवि देवेन्द्र कुमार से दलित कविता के पितामह तेलगू के महाकवि गुर्रम जाशुआ तक। दक्षिण के कुछ कालजयी रचनाकारों पर लिखी गई तलस्पर्शी टिप्पणियाँ इस पुस्तक को एक और विस्तार देती हैं और थोड़ी-सी अखिल भारतीयता भी।
पारदर्शी और कसी हुई भाषा में लिखे गए ये आलेख कुछ समय पूर्व दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में क्रमिक रूप से छपे थे और वृहत्तर पाठक-समुदाय द्वारा पढ़े-सराहे गए थे। कुछ नई सामग्री के साथ उन आलेखों को एक जगह एक साथ पढ़ना एक अलग ढंग का अनुभव होगा और शायद एक आवयिक संग्रथन का सूचक भी। ‘kabristan mein panchayat’ kavi kedarnath sinh ki ek gadya kriti hai—ek kavi ke gadya ka ek vilakshan namuna—jismen uski soch, anubhav aur uske pure parivesh ki kuchh marmik chhaviyan milengi aur beshak ve chintayen bhi jo sirf ek lekhak ki nahin hain. Pustak ke naam mein jo vyangyarth hai, vah hamare samay ke gahre udvelan ki or sanket karta hai aur shayad is baat ki or bhi ki is abolepan ki had tak bante hue samay mein paraspar batchit ke siva koi rasta nahin. Ye abolapan itna gahra hai aur itni dur tak phaila hua ki aaj ek man aur ‘uske dvara rachi gai uski apni hi srishti’ ke bich ek lambi phank aa gai hai. Is pustak ke zyadatar aalekh inhin phankon ya dararon ke bodh se paida hue hain—phir vah akka mahadevi ki pida-bhari chunauti ho ya ek rahasymay dard se ek mamuli aadmi ka mar jana. In aalekhon mein ek sukhad vividhta milegi, jiska phalak ek or vakyapdiyam se kolkata ki sadak par padi ghayal chidiya tak phaila hai aur dusri or vismrit dalit kavi devendr kumar se dalit kavita ke pitamah telgu ke mahakavi gurram jashua tak. Dakshin ke kuchh kalajyi rachnakaron par likhi gai talasparshi tippaniyan is pustak ko ek aur vistar deti hain aur thodi-si akhil bhartiyta bhi.
Pardarshi aur kasi hui bhasha mein likhe ge ye aalekh kuchh samay purv dainik ‘hindustan’ mein krmik rup se chhape the aur vrihattar pathak-samuday dvara padhe-sarahe ge the. Kuchh nai samagri ke saath un aalekhon ko ek jagah ek saath padhna ek alag dhang ka anubhav hoga aur shayad ek aavyik sangrthan ka suchak bhi.