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नारी-स्वातंत्र्य के लिए प्रतिभूत इस युग में सुपरिचित लेखिका मधु भादुड़ी का यह उपन्यास कुछ बुनियादी सवाल उठाता है। नारी विवाहित हो या अविवाहित—आर्थिक स्वावलम्बन उसके लिए बहुत ज़रूरी है, लेकिन आर्थिक रूप से स्वावलम्बी स्त्रियाँ भी क्या इस समाज में अपने आत्मसम्मान, स्वाभिमान और स्वातंत्र्य को बनाए रख पा... Read More

Description

नारी-स्वातंत्र्य के लिए प्रतिभूत इस युग में सुपरिचित लेखिका मधु भादुड़ी का यह उपन्यास कुछ बुनियादी सवाल उठाता है। नारी विवाहित हो या अविवाहित—आर्थिक स्वावलम्बन उसके लिए बहुत ज़रूरी है, लेकिन आर्थिक रूप से स्वावलम्बी स्त्रियाँ भी क्या इस समाज में अपने आत्मसम्मान, स्वाभिमान और स्वातंत्र्य को बनाए रख पा रही हैं? सुखवादी सपनों में खोई रहनेवाली पढ़ी-लिखी निशा अगर एक ‘सम्पन्न घर की बहू’ बनने के अपने और अपने माता-पिता के व्यामोह का शिकार हो जाती है, और अनपढ़ लाजो अगर कठोर श्रम के बावजूद अपने शराबी पति की ‘सेवा का धर्म’ निबाहे जा रही है, तो यह मसला शिक्षा और श्रम से ही हल होनेवाला नहीं है। इसके लिए तो वस्तुत: उसे अपने गले-सड़े संस्कारों से लड़ना होगा। यही कारण है कि लेखिका ने सुषमा जैसे नारी-चरित्र की रचना की है। सुषमा इस उपन्यास की केन्द्रीय पात्र है, जिसके आत्मसंघर्ष में सम्भवत: नारी-स्वातंत्र्य के सही मायने निहित हैं, क्योंकि इसे वह स्त्री के बाह्य व्यक्तित्व और व्यवहार तक ही सीमित नहीं मानती, बल्कि यह चीज़ उसकी अस्मिता और समूची मानसिक संरचना के साथ जुड़ी हुई है। Nari-svatantrya ke liye pratibhut is yug mein suparichit lekhika madhu bhadudi ka ye upanyas kuchh buniyadi saval uthata hai. Nari vivahit ho ya avivahit—arthik svavlamban uske liye bahut zaruri hai, lekin aarthik rup se svavlambi striyan bhi kya is samaj mein apne aatmsamman, svabhiman aur svatantrya ko banaye rakh pa rahi hain? sukhvadi sapnon mein khoi rahnevali padhi-likhi nisha agar ek ‘sampann ghar ki bahu’ banne ke apne aur apne mata-pita ke vyamoh ka shikar ho jati hai, aur anpadh lajo agar kathor shram ke bavjud apne sharabi pati ki ‘seva ka dharm’ nibahe ja rahi hai, to ye masla shiksha aur shram se hi hal honevala nahin hai. Iske liye to vastut: use apne gale-sade sanskaron se ladna hoga. Yahi karan hai ki lekhika ne sushma jaise nari-charitr ki rachna ki hai. Sushma is upanyas ki kendriy patr hai, jiske aatmsangharsh mein sambhvat: nari-svatantrya ke sahi mayne nihit hain, kyonki ise vah stri ke bahya vyaktitv aur vyavhar tak hi simit nahin manti, balki ye chiz uski asmita aur samuchi mansik sanrachna ke saath judi hui hai.