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Jung Andhvishwaso Ki

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कुशेरा के नेत्रोपचार करनेवाले गुरव बंधु हों, निःसन्‍तानों को सन्‍तान प्रदान करानेवाली पार्वती माँ हों, या एक ही प्रयास में व्यसनमुक्त करानेवाले शेषराव महाराज हों, थोड़ा-सा विचार करें, तो समझ में आता है कि लोग असहाय होते हैं। अतः वे दैववादी बनते हैं। इसी से अंधविश्वास का जन्म होता है।... Read More

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Description

कुशेरा के नेत्रोपचार करनेवाले गुरव बंधु हों, निःसन्‍तानों को सन्‍तान प्रदान करानेवाली पार्वती माँ हों, या एक ही प्रयास में व्यसनमुक्त करानेवाले शेषराव महाराज हों, थोड़ा-सा विचार करें, तो समझ में आता है कि लोग असहाय होते हैं। अतः वे दैववादी बनते हैं। इसी से अंधविश्वास का जन्म होता है। समाज जागरूक नहीं है। लोग अविवेकी, व्याकुल हैं, यह बिल्कुल सच है; लेकिन क्या लोगों की इस कमज़ोरी का इस्तेमाल उनकी लूट करने के लिए किया जाए? क्या लोगों की पीड़ा से अपनी झोली भरी जाए?
लोग श्रद्धा रखते हैं, देवाचार माननेवाले हैं, इसका यह मतलब नहीं कि लोग मूर्ख हैं और इसी कारण वे श्रद्धा, देवाचार, नैतिकता, पवित्रता आदि से सम्‍बन्धित बन्‍धनों का पालन करते हैं। हम देवताओं की ओर जाते हैं, वह चमत्कार के डर से नहीं बल्कि प्रेमभाव के कारण होता है। लेकिन प्रेम में भय और दहशत का कोई स्थान नहीं है। इस श्रद्धा में जो चीज़ें ग़ैरज़रूरी और अतार्किक हैं, उनका परीक्षण क्यों न किया जाए? कालबाह्य मूल्यों के प्रभावहीन होने से तथा नवविचारों के प्रभावी व्यवहार से लोग परिवर्तन चाहते हैं। हम जब ऐसा कहते हैं कि हिन्‍दू धर्म की बुनियादी मूल्य-व्यवस्था ही असमानता पर आधारित है, तो वास्तव में यह विधान भूतकाल को सम्बोधित करके किया गया होता है। जन्म से जातीय वरीयता का पुनरुज्जीवन आज कोई नहीं चाहता। प्रत्येक धर्म में मूल नीति तत्त्व बहुतांश रूप में समान हैं। प्रखर नास्तिक भी इसे स्वीकार करेगा। धर्म जब कर्मकांड मात्र रह जाता है, तब उसका विकृतिकरण होता है। क्या चमत्कार धर्मश्रद्धा का हिस्सा है?
स्वामी विवेकानन्‍द कहते हैं, "जिस शुद्ध हिन्‍दू धर्म का सम्मान मैं करता हूँ, वह चमत्कार पर आधारित नहीं है। चमत्कार एवं गूढ़ता के पीछे मत पड़ो। चमत्कार सत्य-प्राप्ति के मार्ग में आनेवाला सबसे बड़ा रोड़ा है। चमत्कारों का पागलपन हमें नादान और कमज़ोर बनाता है।"
इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में 'महाराष्ट्र अन्‍धश्रद्धा निर्मूलन समिति' विगत 24 वर्षों से कार्यरत है। अपने नि:स्वार्थ कार्यकर्ताओं के साथ उसने इस दौरान अनेक बार आन्‍दोलन किए हैं, अनेक बार अपनी जान जोखिम में डालकर और अपनी जेब से पैसा ख़र्च करके समाज में चल रहे अन्‍धविश्वासों के व्यापार का विरोध किया है। इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ आन्‍दोलनों की रपट है। इन घटनाओं का विवरण पढ़कर पाठक स्वयं ही समझ सकता है कि अन्‍धविश्वासों से यह जंग कितनी ख़तरनाक लेकिन कितनी ज़रूरी है। Kushera ke netropchar karnevale gurav bandhu hon, niःsan‍tanon ko san‍tan prdan karanevali parvti man hon, ya ek hi pryas mein vyasanmukt karanevale sheshrav maharaj hon, thoda-sa vichar karen, to samajh mein aata hai ki log ashay hote hain. Atः ve daivvadi bante hain. Isi se andhvishvas ka janm hota hai. Samaj jagruk nahin hai. Log aviveki, vyakul hain, ye bilkul sach hai; lekin kya logon ki is kamzori ka istemal unki lut karne ke liye kiya jaye? kya logon ki pida se apni jholi bhari jaye?Log shraddha rakhte hain, devachar mannevale hain, iska ye matlab nahin ki log murkh hain aur isi karan ve shraddha, devachar, naitikta, pavitrta aadi se sam‍bandhit ban‍dhanon ka palan karte hain. Hum devtaon ki or jate hain, vah chamatkar ke dar se nahin balki prembhav ke karan hota hai. Lekin prem mein bhay aur dahshat ka koi sthan nahin hai. Is shraddha mein jo chizen gairazruri aur atarkik hain, unka parikshan kyon na kiya jaye? kalbahya mulyon ke prbhavhin hone se tatha navavicharon ke prbhavi vyavhar se log parivartan chahte hain. Hum jab aisa kahte hain ki hin‍du dharm ki buniyadi mulya-vyvastha hi asmanta par aadharit hai, to vastav mein ye vidhan bhutkal ko sambodhit karke kiya gaya hota hai. Janm se jatiy variyta ka punrujjivan aaj koi nahin chahta. Pratyek dharm mein mul niti tattv bahutansh rup mein saman hain. Prkhar nastik bhi ise svikar karega. Dharm jab karmkand matr rah jata hai, tab uska vikritikran hota hai. Kya chamatkar dharmashraddha ka hissa hai?
Svami vivekanan‍da kahte hain, "jis shuddh hin‍du dharm ka samman main karta hun, vah chamatkar par aadharit nahin hai. Chamatkar evan gudhta ke pichhe mat pado. Chamatkar satya-prapti ke marg mein aanevala sabse bada roda hai. Chamatkaron ka pagalpan hamein nadan aur kamzor banata hai. "
Isi vaicharik prishthbhumi mein maharashtr an‍dhashraddha nirmulan samiti vigat 24 varshon se karyrat hai. Apne ni:svarth karykartaon ke saath usne is dauran anek baar aan‍dolan kiye hain, anek baar apni jaan jokhim mein dalkar aur apni jeb se paisa kharch karke samaj mein chal rahe an‍dhavishvason ke vyapar ka virodh kiya hai. Is pustak mein aise hi kuchh aan‍dolnon ki rapat hai. In ghatnaon ka vivran padhkar pathak svayan hi samajh sakta hai ki an‍dhavishvason se ye jang kitni khatarnak lekin kitni zaruri hai.