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Jo Aage hain

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दियरा की बलुआही ज़मीन हो या टाल की रेतीली धरती, दक्षिण का सपाट, मैदानी इलाक़ा हो या उत्तर की नदियाई भूमि, बिहार के गाँव का अतीत जाने बग़ैर कैसे कोई बिहार के वर्तमान को समझने का दावा कर सकता है! न जाने कितने दशक बिहार की मेहनतकश आबादियाँ अपने अधिकारों... Read More

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Description

दियरा की बलुआही ज़मीन हो या टाल की रेतीली धरती, दक्षिण का सपाट, मैदानी इलाक़ा हो या उत्तर की नदियाई भूमि, बिहार के गाँव का अतीत जाने बग़ैर कैसे कोई बिहार के वर्तमान को समझने का दावा कर सकता है!
न जाने कितने दशक बिहार की मेहनतकश आबादियाँ अपने अधिकारों से वंचित रही हैं। थोड़े-से असरदार लोगों ने सत्ता और समाज को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर रखा है। हाशिए पर पड़ी कमज़ोर इंसानी ज़िन्‍दगियाँ काली ताक़तों से मुक़ाबला करने की हिम्मत जुटाती रही हैं।
बिहार के गाँव की इस तल्ख़ सच्चाई से रू-ब-रू हुए बिना कोई इसकी तक़दीर लिखने की कोशिश करे, तो यह कोशिश कैसे कामयाब होगी!
हाल के वर्षों में, बिहार के गाँव में बदलाव की जो बयार चली है, उसे शीत-भवनों में बैठकर नहीं आँका जा सकता। शीत-भवनों में तैयार किए गए गणित ज़मीन से कटे होने पर, अख़बार की सुर्खियों में या टेलीविज़न के पर्दे पर थोड़ी देर के लिए ज़रूर जगह पा सकते हैं, मगर ये गणित सच्चाई का रूप नहीं ले सकते।
सच्चाई का रूप तो ये तभी लेंगे, जब इसके गणितकार कमज़ोर तबक़ों की हक़मारी का अपना सदियों पुराना राग अलापना छोड़ दें।
जाबिर हुसेन ने जो भी लिखा है, अपने संघर्षपूर्ण सामाजिक सरोकारों की आग में तपकर लिखा है। Diyra ki baluahi zamin ho ya taal ki retili dharti, dakshin ka sapat, maidani ilaqa ho ya uttar ki nadiyai bhumi, bihar ke ganv ka atit jane bagair kaise koi bihar ke vartman ko samajhne ka dava kar sakta hai!Na jane kitne dashak bihar ki mehanatkash aabadiyan apne adhikaron se vanchit rahi hain. Thode-se asardar logon ne satta aur samaj ko apni mutthi mein qaid kar rakha hai. Hashiye par padi kamzor insani zin‍dagiyan kali taqton se muqabla karne ki himmat jutati rahi hain.
Bihar ke ganv ki is talkh sachchai se ru-ba-ru hue bina koi iski taqdir likhne ki koshish kare, to ye koshish kaise kamyab hogi!
Haal ke varshon mein, bihar ke ganv mein badlav ki jo bayar chali hai, use shit-bhavnon mein baithkar nahin aanka ja sakta. Shit-bhavnon mein taiyar kiye ge ganit zamin se kate hone par, akhbar ki surkhiyon mein ya telivizan ke parde par thodi der ke liye zarur jagah pa sakte hain, magar ye ganit sachchai ka rup nahin le sakte.
Sachchai ka rup to ye tabhi lenge, jab iske ganitkar kamzor tabqon ki haqmari ka apna sadiyon purana raag alapna chhod den.
Jabir husen ne jo bhi likha hai, apne sangharshpurn samajik sarokaron ki aag mein tapkar likha hai.