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Jatil Rog Saral Upchar

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कायासुख ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है। मन और शरीर बीमार और लाचार हों, तो जीवन की हर प्राप्ति, हर ख़ुशी आधी-अधूरी और बेमायने-सी लगने लगती है। पर जीवन की रौ में आदमी अक्सर ही इस साधारण से सत्य को भुला बैठता है। बिरले ही ऐसे होते हैं जो... Read More

Description

कायासुख ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है। मन और शरीर बीमार और लाचार हों, तो जीवन की हर प्राप्ति, हर ख़ुशी आधी-अधूरी और बेमायने-सी लगने लगती है। पर जीवन की रौ में आदमी अक्सर ही इस साधारण से सत्य को भुला बैठता है। बिरले ही ऐसे होते हैं जो शुरू से ही तन्दुरुस्ती का महत्त्व समझते हैं और उसी के रास्ते पर चलते हैं। पर ज़्यादातर लोग न तो क़िस्मत के इतने धनी होते हैं, न ही आनुवंशिक काठी के, और न ही समय से चेतते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी दौलत उनके पास बनी रहे। यंत्रवत् जीवन की चकाचौंध में जीता आदमी जब होश सँभालता है, तब तक अक्सर वह अपनी उदासीनता की क़ीमत दे चुका होता है। उसके असंयमित रहन-सहन, खान-पान, चाल-चलन में कब कौन-सा अंग बीमार हो जाता है, इसका भी उसे तब पता चलता है जब पानी सर तक चढ़ चुका होता है। इस भँवर से बचकर निकलने के लिए दुगुने संकल्प की ज़रूरत होती है। न सिर्फ़ दवा की अनिवार्यता होती है, बल्कि जीने का ढंग भी बदलना पड़ता है। तभी कहीं जीवन ढंग से आगे बढ़ पाता है। सबसे अच्छा तो यह है कि आदमी शुरू से ही जगा रहे। बचाव इलाज से लाख गुना अच्छा है। उसी में शहनाई की मिठास है। क़ुदरत के साधारण नियमों का अनुसरण करना इसका सत्य-सार है। आपके जीवन में सुख का अमृत-कलश सदा भरा रहे, यही मेरी प्रार्थना है। किसी समय रुग्णता के बादल घिर आएँ, चारों तरफ़ अँधियारा दिखे, तब भी यह कृति आपको उस घटाटोप अँधेरे से बाहर खींच लाए, तभी इसकी रचना सफल समझूँगा। Kayasukh hi jivan ki sabse badi daulat hai. Man aur sharir bimar aur lachar hon, to jivan ki har prapti, har khushi aadhi-adhuri aur bemayne-si lagne lagti hai. Par jivan ki rau mein aadmi aksar hi is sadharan se satya ko bhula baithta hai. Birle hi aise hote hain jo shuru se hi tandurusti ka mahattv samajhte hain aur usi ke raste par chalte hain. Par zyadatar log na to qismat ke itne dhani hote hain, na hi aanuvanshik kathi ke, aur na hi samay se chette hain ki jivan ki sabse badi daulat unke paas bani rahe. Yantrvat jivan ki chakachaundh mein jita aadmi jab hosh sanbhalata hai, tab tak aksar vah apni udasinta ki qimat de chuka hota hai. Uske asanymit rahan-sahan, khan-pan, chal-chalan mein kab kaun-sa ang bimar ho jata hai, iska bhi use tab pata chalta hai jab pani sar tak chadh chuka hota hai. Is bhanvar se bachkar nikalne ke liye dugune sankalp ki zarurat hoti hai. Na sirf dava ki anivaryta hoti hai, balki jine ka dhang bhi badalna padta hai. Tabhi kahin jivan dhang se aage badh pata hai. Sabse achchha to ye hai ki aadmi shuru se hi jaga rahe. Bachav ilaj se lakh guna achchha hai. Usi mein shahnai ki mithas hai. Qudrat ke sadharan niymon ka anusran karna iska satya-sar hai. Aapke jivan mein sukh ka amrit-kalash sada bhara rahe, yahi meri prarthna hai. Kisi samay rugnta ke badal ghir aaen, charon taraf andhiyara dikhe, tab bhi ye kriti aapko us ghatatop andhere se bahar khinch laye, tabhi iski rachna saphal samjhunga.