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Jan Nayak Krishna

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वीरेन्द्र सारंग का यह नया उपन्यास इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि यह महाभारत काल और कृष्ण से जुड़े मिथकों को एक नई दृष्टि से देखता है। इसका असली सार कृष्ण के उस जननायक रूप का है जिसे बाक़ायदा राजनीति के तहत नन्द और वासुदेव समर्थकों ने उनके बचपन से... Read More

Description

वीरेन्द्र सारंग का यह नया उपन्यास इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि यह महाभारत काल और कृष्ण से जुड़े मिथकों को एक नई दृष्टि से देखता है। इसका असली सार कृष्ण के उस जननायक रूप का है जिसे बाक़ायदा राजनीति के तहत नन्द और वासुदेव समर्थकों ने उनके बचपन से ही मिथकीय रूप दिया ताकि कंस के ख़‍िलाफ़ जनता को एकजुट किया जा सके। कंस असुर है जो देवताओं और आर्यों के चंगुल में फँसकर क्रूर और तानाशाह हो गया है। उग्रसेन नाक़ाबिल और कमज़ोर राजा हैं जिन्हें हटाकर कंस राजा बनता है ताकि अपनी अनार्य संस्कृति की रक्षा की जा सके, जो मूलत: गोपालक और कृषक जाति है। देवता आर्य संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं जो मूलत: उपभोग की संस्कृति है।
इस उपन्यास की ख़ासियत यह है कि मिथकों में जिनको राक्षसों का रूप दिया जाता है, लेखक ने बहुत यथार्थवादी दृष्टि से उनका मानवीकरण कर दिया है, उनके सुख-दु:ख का भी। उपन्यास का सबसे दिलचस्प हिस्सा कृष्ण के बुढ़ापे का है जब सब कुछ उनके हाथ से निकल जाता है। द्वारका में अराजकता फैल चुकी है और कृष्ण बहुत अकेले पड़ गए हैं। वे अपनी झोली लेकर द्वारका छोड़ देते हैं। उनकी मृत्यु का प्रसंग और भी दारुण है। क्या हर क्रान्ति का यही हश्र होता है? शायद यह सत्ता का चरित्र है जो किसी को भी निरंकुश बना देती है। जिस शान्ति के लिए कृष्ण द्वारका आए, वह अराजक हो गई। उनकी अपनी ही सन्तानें उनके ख़‍िलाफ़। कुल मिलाकर यह उपन्यास कृष्ण-कथा का नया और दिलचस्प भाष्य प्रस्तुत करता है जो बेहद पठनीय है। Virendr sarang ka ye naya upanyas is mayne mein mahattvpurn hai ki ye mahabharat kaal aur krishn se jude mithkon ko ek nai drishti se dekhta hai. Iska asli saar krishn ke us jannayak rup ka hai jise baqayda rajniti ke tahat nand aur vasudev samarthkon ne unke bachpan se hi mithkiy rup diya taki kans ke kha‍ilaf janta ko ekjut kiya ja sake. Kans asur hai jo devtaon aur aaryon ke changul mein phansakar krur aur tanashah ho gaya hai. Ugrsen naqabil aur kamzor raja hain jinhen hatakar kans raja banta hai taki apni anarya sanskriti ki raksha ki ja sake, jo mulat: gopalak aur krishak jati hai. Devta aarya sanskriti ko badhava dena chahte hain jo mulat: upbhog ki sanskriti hai. Is upanyas ki khasiyat ye hai ki mithkon mein jinko rakshson ka rup diya jata hai, lekhak ne bahut yatharthvadi drishti se unka manvikran kar diya hai, unke sukh-du:kha ka bhi. Upanyas ka sabse dilchasp hissa krishn ke budhape ka hai jab sab kuchh unke hath se nikal jata hai. Dvarka mein arajakta phail chuki hai aur krishn bahut akele pad ge hain. Ve apni jholi lekar dvarka chhod dete hain. Unki mrityu ka prsang aur bhi darun hai. Kya har kranti ka yahi hashr hota hai? shayad ye satta ka charitr hai jo kisi ko bhi nirankush bana deti hai. Jis shanti ke liye krishn dvarka aae, vah arajak ho gai. Unki apni hi santanen unke kha‍ilaf. Kul milakar ye upanyas krishn-katha ka naya aur dilchasp bhashya prastut karta hai jo behad pathniy hai.