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Jalsaghar

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...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है,... Read More

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Description

...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता? . . . Gomti mein jo layatmakta kabhi-kabhi vilin ho jati hai, use kumar gandharv aur begam akhtar barambar aavaz dete hain. Thakur onkarnath vidyapati ke padon ki bhanti, bijon ki bhanti dharti par lot-pot jate hain. . . Par is pipasa-yatra ka kahin ant nahin hota. Vilas murjha jata hai, shringar basi ho jata hai, kin kanthon mein hi vilin ho jata hai aur tab keval gayak tatha vadak mein se ek anasakt sannyasi janm leta dikhai deta hai. . . . . . . Main vadak ko dekh raha tha ya uske terakota ko. Kis kaal ka, yug ka vah terakota tha, main nahin janta. Terakota ki koi lipi nahin hoti aur yadi koi lipi hoti bhi to mere liye vah vyarth hi hoti. Mera us sannyasi se bhashahin abadh parichay ho chuka tha. Vina thi, siddh vadak tha, vadan ki apratimta ni:sandeh thi aur tha phalgun ratri ka vah jalsaghar, par sab kuchh apni nirmam yatharthta mein vaisa avishvasniy tha. . . . . . . Jip bhagti chali ja rahi thi. Jab hum bandh par chadh rahe the tab bhi vah vadan spasht tha, yadyapi ab uski parismapti hone hi ja rahi thi. Main aise vadan ki parismapti ka sakshat nahin kar sakta tha. Samapti vaise bhi sakshat karne ke liye hoti bhi nahin. Main us vihag, us vadan aur us sannyasi vadak ko ganga-kshetr ke us jalsaghar mein chhod aaya tha, parantu mere saath uska terakota sada ke liye chala aaya. Mujhmen nishchay hi apradh bhav tha ki main bahut bada apman karke aa raha hun. Main is agnitpe terakota ko sambhav hai, jivan-bhar vahan kar sakun, par us vadan ke baad us vadak ka yadi sakshat karna padta to—to kaun parthsarthi mujhe bachata?