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Jab Jyoti Jagi

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भारतीय स्वाधीनता-आन्दोलन में बिना किसी प्रकार की सुयश-प्राप्ति की कामना किए हँसते-हँसते फाँसी के तख़्ते पर झूल जानेवाले मृत्युंजयी वीरों के बलिदान का सर्वाधिक महत्त्व रहा है। उन वीरों को जितनी प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त होना चाहिए था, उसकी उपेक्षा एवं अवहेलना सत्ता-लोलुप स्वार्थियों ने सदैव ही की है। यदि... Read More

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Description

भारतीय स्वाधीनता-आन्दोलन में बिना किसी प्रकार की सुयश-प्राप्ति की कामना किए हँसते-हँसते फाँसी के तख़्ते पर झूल जानेवाले मृत्युंजयी वीरों के बलिदान का सर्वाधिक महत्त्व रहा है। उन वीरों को जितनी प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त होना चाहिए था, उसकी उपेक्षा एवं अवहेलना सत्ता-लोलुप स्वार्थियों ने सदैव ही की है। यदि उन वीरों की नि:स्वार्थ मातृ-भूमि-सेवा का अनुकरण किया गया होता तो भारतीय जनता आज स्वर्ग-सुख का उपभोग निस्सन्देह करती होती।
पराधीनता के समय जो भी क्रान्तिकारी साहित्य उपलब्ध था उसे भारतीय युवक बड़े उत्साह से पढ़ते थे; इसीलिए तत्कालीन युवकों में देश के प्रति नि:स्वार्थ सेवा की सच्ची लगन थी। आज भारतीय जनता, विशेषतः युवकों में सुषुप्त त्याग और सेवा की भावना को जाग्रत करने के लिए उन क्रान्तिकारी वीरों के इतिहास के पठन-पाठन की अत्यधिक आवश्यकता है।
भारतीय क्रान्तिकारियों के सम्बन्ध में अभी तक बहुत कम लिखा गया है। इन क्रान्तिकारियों के सम्बन्ध में पुस्तक लिखने का कार्य अत्यन्त कठिन है क्योंकि सभी क्रान्तिकारी अपने कार्य-कलापों को एकदम गुप्त रखते थे, उनके निकटतम सहयोगी भी उनकी बहुत सी बातों से अपरिचित रहते थे। प्रस्तुत पुस्तक अमर शहीद स्व. चन्द्रशेखर आज़ाद और भगवतीचरण बोहरा के अत्यन्त विश्वासपात्र, क्रान्तिकारी आन्दोलन में निरन्तर कार्य करनेवाले भाई सुखदेव राज जी ने लिखी है। अस्तु, पुस्तक की उपादेयता निर्विवाद है। Bhartiy svadhinta-andolan mein bina kisi prkar ki suyash-prapti ki kamna kiye hansate-hansate phansi ke takhte par jhul janevale mrityunjyi viron ke balidan ka sarvadhik mahattv raha hai. Un viron ko jitni pratishta aur samman prapt hona chahiye tha, uski upeksha evan avhelna satta-lolup svarthiyon ne sadaiv hi ki hai. Yadi un viron ki ni:svarth matri-bhumi-seva ka anukran kiya gaya hota to bhartiy janta aaj svarg-sukh ka upbhog nissandeh karti hoti. Paradhinta ke samay jo bhi krantikari sahitya uplabdh tha use bhartiy yuvak bade utsah se padhte the; isiliye tatkalin yuvkon mein desh ke prati ni:svarth seva ki sachchi lagan thi. Aaj bhartiy janta, visheshatः yuvkon mein sushupt tyag aur seva ki bhavna ko jagrat karne ke liye un krantikari viron ke itihas ke pathan-pathan ki atydhik aavashyakta hai.
Bhartiy krantikariyon ke sambandh mein abhi tak bahut kam likha gaya hai. In krantikariyon ke sambandh mein pustak likhne ka karya atyant kathin hai kyonki sabhi krantikari apne karya-kalapon ko ekdam gupt rakhte the, unke nikattam sahyogi bhi unki bahut si baton se aparichit rahte the. Prastut pustak amar shahid sv. Chandrshekhar aazad aur bhagavtichran bohra ke atyant vishvaspatr, krantikari aandolan mein nirantar karya karnevale bhai sukhdev raaj ji ne likhi hai. Astu, pustak ki upadeyta nirvivad hai.