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Jab Jindagi Muskura Di?

K. D. Singh

Rs. 400

बहुपठित युवा व्यंग्यकार के.डी. सिंह की यह किताब दरअसल जीवन की गुज़री राहों से कुछ यादगार टुकड़े समेटती है, जो लेखक के तो हैं ही, इसमें आप और हम भी होंगे। इन्हीं टुकड़ा-टुकड़ा स्मृतियों को सहेजती हुई ये किताब 'जब ज़‍िन्‍दगी मुस्कुरा दी' लेखक के चालीस वर्षों के सिंहावलोकन के... Read More

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बहुपठित युवा व्यंग्यकार के.डी. सिंह की यह किताब दरअसल जीवन की गुज़री राहों से कुछ यादगार टुकड़े समेटती है, जो लेखक के तो हैं ही, इसमें आप और हम भी होंगे। इन्हीं टुकड़ा-टुकड़ा स्मृतियों को सहेजती हुई ये किताब 'जब ज़‍िन्‍दगी मुस्कुरा दी' लेखक के चालीस वर्षों के सिंहावलोकन के कुछ पुंज, कुछ अपने, कुछ अपनों के अनुभव...अच्छे-बुरे लोगों के सानिध्य और कच्चे पक्के दुनियावी रास्तों से गुज़रते हुए, जीवन के कुछ अनमोल और न भूलनेवाले चित्रों का संकलन है, जो जीवन की स्मृतियों को सार्वजनिक तौर पर साझा करते हैं। ये संस्मरण हैं, स्मृति चित्र हैं...बीती ज़ि‍न्‍दगी के, पर जिनकी रोशनी आगे के जीवन-पथ को भी आलोकित करती है...
जाने कितना जीवन,
पीछे छूट गया अनजाने में
अब तो कुछ क़तरे हैं बाक़ी,
साँसों के पैमाने में...
इतना जान लिया तो यारो,
कैसी बन्दिश उनवाँ की
अपना-अपना रंग भरेगा,
हर कोई अफ़साने में....!! Bahupthit yuva vyangykar ke. Di. Sinh ki ye kitab darasal jivan ki guzri rahon se kuchh yadgar tukde sametti hai, jo lekhak ke to hain hi, ismen aap aur hum bhi honge. Inhin tukda-tukda smritiyon ko sahejti hui ye kitab jab za‍in‍dagi muskura di lekhak ke chalis varshon ke sinhavlokan ke kuchh punj, kuchh apne, kuchh apnon ke anubhav. . . Achchhe-bure logon ke sanidhya aur kachche pakke duniyavi raston se guzarte hue, jivan ke kuchh anmol aur na bhulnevale chitron ka sanklan hai, jo jivan ki smritiyon ko sarvajnik taur par sajha karte hain. Ye sansmran hain, smriti chitr hain. . . Biti zi‍‍dagi ke, par jinki roshni aage ke jivan-path ko bhi aalokit karti hai. . . Jane kitna jivan,
Pichhe chhut gaya anjane mein
Ab to kuchh qatre hain baqi,
Sanson ke paimane mein. . .
Itna jaan liya to yaro,
Kaisi bandish unvan ki
Apna-apna rang bharega,
Har koi afsane mein. . . . !!

Description

बहुपठित युवा व्यंग्यकार के.डी. सिंह की यह किताब दरअसल जीवन की गुज़री राहों से कुछ यादगार टुकड़े समेटती है, जो लेखक के तो हैं ही, इसमें आप और हम भी होंगे। इन्हीं टुकड़ा-टुकड़ा स्मृतियों को सहेजती हुई ये किताब 'जब ज़‍िन्‍दगी मुस्कुरा दी' लेखक के चालीस वर्षों के सिंहावलोकन के कुछ पुंज, कुछ अपने, कुछ अपनों के अनुभव...अच्छे-बुरे लोगों के सानिध्य और कच्चे पक्के दुनियावी रास्तों से गुज़रते हुए, जीवन के कुछ अनमोल और न भूलनेवाले चित्रों का संकलन है, जो जीवन की स्मृतियों को सार्वजनिक तौर पर साझा करते हैं। ये संस्मरण हैं, स्मृति चित्र हैं...बीती ज़ि‍न्‍दगी के, पर जिनकी रोशनी आगे के जीवन-पथ को भी आलोकित करती है...
जाने कितना जीवन,
पीछे छूट गया अनजाने में
अब तो कुछ क़तरे हैं बाक़ी,
साँसों के पैमाने में...
इतना जान लिया तो यारो,
कैसी बन्दिश उनवाँ की
अपना-अपना रंग भरेगा,
हर कोई अफ़साने में....!! Bahupthit yuva vyangykar ke. Di. Sinh ki ye kitab darasal jivan ki guzri rahon se kuchh yadgar tukde sametti hai, jo lekhak ke to hain hi, ismen aap aur hum bhi honge. Inhin tukda-tukda smritiyon ko sahejti hui ye kitab jab za‍in‍dagi muskura di lekhak ke chalis varshon ke sinhavlokan ke kuchh punj, kuchh apne, kuchh apnon ke anubhav. . . Achchhe-bure logon ke sanidhya aur kachche pakke duniyavi raston se guzarte hue, jivan ke kuchh anmol aur na bhulnevale chitron ka sanklan hai, jo jivan ki smritiyon ko sarvajnik taur par sajha karte hain. Ye sansmran hain, smriti chitr hain. . . Biti zi‍‍dagi ke, par jinki roshni aage ke jivan-path ko bhi aalokit karti hai. . . Jane kitna jivan,
Pichhe chhut gaya anjane mein
Ab to kuchh qatre hain baqi,
Sanson ke paimane mein. . .
Itna jaan liya to yaro,
Kaisi bandish unvan ki
Apna-apna rang bharega,
Har koi afsane mein. . . . !!

Additional Information
Book Type

Black

Publisher
Language
ISBN
Pages
Publishing Year

Jab Jindagi Muskura Di?

बहुपठित युवा व्यंग्यकार के.डी. सिंह की यह किताब दरअसल जीवन की गुज़री राहों से कुछ यादगार टुकड़े समेटती है, जो लेखक के तो हैं ही, इसमें आप और हम भी होंगे। इन्हीं टुकड़ा-टुकड़ा स्मृतियों को सहेजती हुई ये किताब 'जब ज़‍िन्‍दगी मुस्कुरा दी' लेखक के चालीस वर्षों के सिंहावलोकन के कुछ पुंज, कुछ अपने, कुछ अपनों के अनुभव...अच्छे-बुरे लोगों के सानिध्य और कच्चे पक्के दुनियावी रास्तों से गुज़रते हुए, जीवन के कुछ अनमोल और न भूलनेवाले चित्रों का संकलन है, जो जीवन की स्मृतियों को सार्वजनिक तौर पर साझा करते हैं। ये संस्मरण हैं, स्मृति चित्र हैं...बीती ज़ि‍न्‍दगी के, पर जिनकी रोशनी आगे के जीवन-पथ को भी आलोकित करती है...
जाने कितना जीवन,
पीछे छूट गया अनजाने में
अब तो कुछ क़तरे हैं बाक़ी,
साँसों के पैमाने में...
इतना जान लिया तो यारो,
कैसी बन्दिश उनवाँ की
अपना-अपना रंग भरेगा,
हर कोई अफ़साने में....!! Bahupthit yuva vyangykar ke. Di. Sinh ki ye kitab darasal jivan ki guzri rahon se kuchh yadgar tukde sametti hai, jo lekhak ke to hain hi, ismen aap aur hum bhi honge. Inhin tukda-tukda smritiyon ko sahejti hui ye kitab jab za‍in‍dagi muskura di lekhak ke chalis varshon ke sinhavlokan ke kuchh punj, kuchh apne, kuchh apnon ke anubhav. . . Achchhe-bure logon ke sanidhya aur kachche pakke duniyavi raston se guzarte hue, jivan ke kuchh anmol aur na bhulnevale chitron ka sanklan hai, jo jivan ki smritiyon ko sarvajnik taur par sajha karte hain. Ye sansmran hain, smriti chitr hain. . . Biti zi‍‍dagi ke, par jinki roshni aage ke jivan-path ko bhi aalokit karti hai. . . Jane kitna jivan,
Pichhe chhut gaya anjane mein
Ab to kuchh qatre hain baqi,
Sanson ke paimane mein. . .
Itna jaan liya to yaro,
Kaisi bandish unvan ki
Apna-apna rang bharega,
Har koi afsane mein. . . . !!