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Hum Nahin Change Bura Na Koy

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लोकप्रिय साहित्य हिन्दी अकादमिक जगत के लिए मूल्यांकन की चीज़ कभी नहीं रहा, लेकिन हिन्दी के शिक्षित समाज का बड़ा तबका उसके ही असर में रहता आया है। हमें लोकप्रिय साहित्य का बाज़ार तो दिखता है, उसकी आन्तरिक दुनिया की बनावट नहीं दिखती। ऐसे में लोकप्रिय लेखन के एक बड़े... Read More

Description

लोकप्रिय साहित्य हिन्दी अकादमिक जगत के लिए मूल्यांकन की चीज़ कभी नहीं रहा, लेकिन हिन्दी के शिक्षित समाज का बड़ा तबका उसके ही असर में रहता आया है। हमें लोकप्रिय साहित्य का बाज़ार तो दिखता है, उसकी आन्तरिक दुनिया की बनावट नहीं दिखती। ऐसे में लोकप्रिय लेखन के एक बड़े नाम सुरेन्द्र मोहन पाठक अपनी आत्मकथा लिखकर बहस और मूल्यांकन की एक नई ज़मीन तैयार कर रहे हैं। उनका अपना जीवन है भी ऐसा जिसके बारे में दूसरों को दिलचस्पी हो। कान में सुनने की मशीन, आँखों पर मोटे लेंस का चश्मा लगाए, नौकरी करते हुए, तीन सौ से अधिक सफल उपन्यास लिखनेवाले पाठक जी अपने ही रचे किसी अमर किरदार जैसे आकर्षक व्यक्तित्व वाले हैं। लेखन के तौर-तरीक़े और ख़ुद के लिए तय किया हुआ अनुशासन अचरजकारी। लाखों पाठकों की रुचि को समझना, उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के दबाव को धत्ता बताते हुए, उनके दिमाग़ पर क़ब्ज़ा जमाना—यह कोई मामूली बात नहीं है। इन सब बातों को समझने में एक औज़ार का काम कर सकती है यह आत्मकथा—'हम नहीं चंगे बुरा न कोय’। यह सुरेन्द्र मोहन पाठक के लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा है। यह उनके समय के पल्प फ़ि‍क्शन इंडस्ट्री को जानने के लिए भी ज़रूरी किताब है। Lokapriy sahitya hindi akadmik jagat ke liye mulyankan ki chiz kabhi nahin raha, lekin hindi ke shikshit samaj ka bada tabka uske hi asar mein rahta aaya hai. Hamein lokapriy sahitya ka bazar to dikhta hai, uski aantrik duniya ki banavat nahin dikhti. Aise mein lokapriy lekhan ke ek bade naam surendr mohan pathak apni aatmaktha likhkar bahas aur mulyankan ki ek nai zamin taiyar kar rahe hain. Unka apna jivan hai bhi aisa jiske bare mein dusron ko dilchaspi ho. Kaan mein sunne ki mashin, aankhon par mote lens ka chashma lagaye, naukri karte hue, tin sau se adhik saphal upanyas likhnevale pathak ji apne hi rache kisi amar kirdar jaise aakarshak vyaktitv vale hain. Lekhan ke taur-tariqe aur khud ke liye tay kiya hua anushasan acharajkari. Lakhon pathkon ki ruchi ko samajhna, unki apekshaon par khara utarne ke dabav ko dhatta batate hue, unke dimag par qabza jamana—yah koi mamuli baat nahin hai. In sab baton ko samajhne mein ek auzar ka kaam kar sakti hai ye aatmaktha—ham nahin change bura na koy’. Ye surendr mohan pathak ke lekhkiy jivan ke sabse halchal vale dinon ki katha hai. Ye unke samay ke palp fi‍kshan indastri ko janne ke liye bhi zaruri kitab hai.