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Hindi Aalochana Ki Paaribhashik Shabdavali

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आधुनिक हिन्‍दी आलोचना की आयु भले ही सौ-सवा सौ वर्ष हो किन्‍तु उसने इतनी तेज़ी से डग भरे कि इस अल्प अवधि में ही दुनिया की किसी भी दूसरी समृद्ध भाषा से होड़ लेने में सक्षम है। आज हिन्‍दी आलोचना में जो पारिभाषिक शब्द प्रचलित हैं, उनके मुख्यतः तीन स्रोत... Read More

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Description

आधुनिक हिन्‍दी आलोचना की आयु भले ही सौ-सवा सौ वर्ष हो किन्‍तु उसने इतनी तेज़ी से डग भरे कि इस अल्प अवधि में ही दुनिया की किसी भी दूसरी समृद्ध भाषा से होड़ लेने में सक्षम है।
आज हिन्‍दी आलोचना में जो पारिभाषिक शब्द प्रचलित हैं, उनके मुख्यतः तीन स्रोत हैं। उनमें सबसे प्रमुख स्रोत हमारा संस्कृत काव्यशास्त्र है, जिसकी समृद्धि तद्युगीन विश्वसाहित्य में अतुलनीय है। हिन्‍दी आलोचना की समृद्धि के पीछे उसकी अपनी यही विरासत है। दूसरा स्रोत यूरोप का साहित्यशास्त्र है, जिससे हमारे लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष से सम्‍बन्‍ध हैं। पिछले कुछ दशकों में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के चलते यूरोप से अनेक नए पारिभाषिक शब्द हिन्‍दी में आए हैं, जिन्हें हिन्‍दी ने पूरी उदारता से ग्रहण किया है। इसी के साथ हिन्‍दी आलोचना ने अनेक शब्द स्वयं भी विकसित किए हैं।
इस समृद्धि के बावजूद हिन्‍दी आलोचना में प्रचलित बहुतेरे पारिभाषिक शब्दों की अवधारणा को रेखांकित करनेवाली पुस्तक की कमी लगातार महसूस की जा रही थी। समकालीन हिन्‍दी आलोचना की इस अनिवार्य आवश्यकता को पूरी करनेवाली यह अकेली पुस्तक है—हिन्‍दी साहित्य के सुधी अध्येताओं के लिए अनिवार्यतः संग्रहणीय। Aadhunik hin‍di aalochna ki aayu bhale hi sau-sava sau varsh ho kin‍tu usne itni tezi se dag bhare ki is alp avadhi mein hi duniya ki kisi bhi dusri samriddh bhasha se hod lene mein saksham hai. Aaj hin‍di aalochna mein jo paribhashik shabd prachlit hain, unke mukhyatः tin srot hain. Unmen sabse prmukh srot hamara sanskrit kavyshastr hai, jiski samriddhi tadyugin vishvsahitya mein atulniy hai. Hin‍di aalochna ki samriddhi ke pichhe uski apni yahi virasat hai. Dusra srot yurop ka sahityshastr hai, jisse hamare lagbhag sadhe tin sau varsh se sam‍ban‍dha hain. Pichhle kuchh dashkon mein udarikran aur bhumandlikran ke chalte yurop se anek ne paribhashik shabd hin‍di mein aae hain, jinhen hin‍di ne puri udarta se grhan kiya hai. Isi ke saath hin‍di aalochna ne anek shabd svayan bhi viksit kiye hain.
Is samriddhi ke bavjud hin‍di aalochna mein prachlit bahutere paribhashik shabdon ki avdharna ko rekhankit karnevali pustak ki kami lagatar mahsus ki ja rahi thi. Samkalin hin‍di aalochna ki is anivarya aavashyakta ko puri karnevali ye akeli pustak hai—hin‍di sahitya ke sudhi adhyetaon ke liye anivaryatः sangrahniy.