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Haadse

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इस आत्मकथा को स्त्री के अपने चुनाव की कहानी भी कहा जा सकता है। पटियाला के बड़े मिलिटरी अफ़सर की ज़िद्दी और अपने मन का करनेवाली लड़की जो अपनी हरकतों से बार-बार बाप और उनके परिवार को असुविधाओं में डालती है, खुली मीटिंगों में उनके सामन्ती दोमुँहेपन पर प्रहार करती... Read More

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Description

इस आत्मकथा को स्त्री के अपने चुनाव की कहानी भी कहा जा सकता है। पटियाला के बड़े मिलिटरी अफ़सर की ज़िद्दी और अपने मन का करनेवाली लड़की जो अपनी हरकतों से बार-बार बाप और उनके परिवार को असुविधाओं में डालती है, खुली मीटिंगों में उनके सामन्ती दोमुँहेपन पर प्रहार करती है, विभाजन की त्रासदी झेलती मुस्लिम महिलाओं की आवाज़ बनकर जवाब माँगती है और फिर अपने मन से क्षत्रिय (राजपूत) परिवार छोड़कर अन्य जाति के लड़के (गुप्ता) से शादी करके बिहार (झारखंड समेत) चली आती है। यहाँ आकर पति से विद्रोह करके मज़दूरों-कामगारों के बीच उनके संघर्ष का जीवन चुनती है।
इस आत्मकथा को सामन्तवाद और लोकतन्त्र के खुले द्वन्द्व की तरह भी पढ़ा जा सकता है।
इन्हीं तूफ़ानी झंझावातों से गुज़रकर आई है रमणिका गुप्ता। आर्य समाज, कांग्रेस, समाजवादी और कम्युनिस्ट होने की उनकी यह यात्रा भारतीय राजनीति के नाटकीय मोड़ों का इतिहास भी है और विकास भी। Is aatmaktha ko stri ke apne chunav ki kahani bhi kaha ja sakta hai. Patiyala ke bade militri afsar ki ziddi aur apne man ka karnevali ladki jo apni harakton se bar-bar baap aur unke parivar ko asuvidhaon mein dalti hai, khuli mitingon mein unke samanti domunhepan par prhar karti hai, vibhajan ki trasdi jhelti muslim mahilaon ki aavaz bankar javab mangati hai aur phir apne man se kshatriy (rajput) parivar chhodkar anya jati ke ladke (gupta) se shadi karke bihar (jharkhand samet) chali aati hai. Yahan aakar pati se vidroh karke mazduron-kamgaron ke bich unke sangharsh ka jivan chunti hai. Is aatmaktha ko samantvad aur loktantr ke khule dvandv ki tarah bhi padha ja sakta hai.
Inhin tufani jhanjhavaton se guzarkar aai hai ramanika gupta. Aarya samaj, kangres, samajvadi aur kamyunist hone ki unki ye yatra bhartiy rajniti ke natkiy modon ka itihas bhi hai aur vikas bhi.