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Gungunate Huye

Dr. Vishambhar Nath Upadhyay

Rs. 200.00 Rs. 180.00

गीत का दमन तो सम्भव है, लेकिन उन्मूलन असम्भव है। क्योंकि गीत और गेयता मनुष्य की नींव में है-प्रकृति में सर्वत्र व्याप्त लय, गीति, गूंज और झंकार की तरह। प्रतिष्ठित, प्रगतिशील कवि एवं विचारक डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के मार्मिक गीतों का यह संग्रह एक प्रीतिकर विस्मय जगाता है। उन्हीं की... Read More

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Description
गीत का दमन तो सम्भव है, लेकिन उन्मूलन असम्भव है। क्योंकि गीत और गेयता मनुष्य की नींव में है-प्रकृति में सर्वत्र व्याप्त लय, गीति, गूंज और झंकार की तरह। प्रतिष्ठित, प्रगतिशील कवि एवं विचारक डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के मार्मिक गीतों का यह संग्रह एक प्रीतिकर विस्मय जगाता है। उन्हीं की बात का हवाला देते हुए कह सकते हैं कि बौद्धिक गद्य के बावजूद 'ये गीत अचानक अवचेतन के तलघर से उदित हुए, बादलों-से घिरे और बरसे, समीरण-से बहे और विहगों की तरह कलरवित हुए। संग्रह के गीत वास्तव में प्रचलित गीतों से भिन्न कवि के नये कलात्मक विचलत् के परिणाम हैं। इनमें रसभीना मन तो है ही, मनन भी है, यथार्थ के दंश भी हैं और आत्मपरामर्श भी है। उल्लेखनीय बात यह है कि इन गीतों को गद्य-कविता के निकट लाने की भी एक सावधान कोशिश की गयी है।