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God

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किसी निकटस्थ की गोद ऐसी भावनात्मक, मन को रोमांचित और अन्तस के तारों को छू लेने और कुरेर देनेवाली गोद होती है, जिसकी तुलना नहीं हो सकती। गोद ममतामयी माँ की हो, स्नेहसिक्त पिता की हो, हर संकट के समय प्रश्रय देनेवाले बड़े भाई की हो या स्नेहमयी भाभी की... Read More

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Description

किसी निकटस्थ की गोद ऐसी भावनात्मक, मन को रोमांचित और अन्तस के तारों को छू लेने और कुरेर देनेवाली गोद होती है, जिसकी तुलना नहीं हो सकती। गोद ममतामयी माँ की हो, स्नेहसिक्त पिता की हो, हर संकट के समय प्रश्रय देनेवाले बड़े भाई की हो या स्नेहमयी भाभी की गोद में ममता और सान्त्वना की अद्वितीय क्षमता होती है।
गोद का यह महत्त्व अद्वितीय है, अतुलनीय है। व्यक्ति कितना भी भटकाव में हो, अपराध कर बैठा हो, किन्तु पश्चात्ताप की भावना से जब अपने वरिष्ठ निकटस्थ की गोद में सर रख देता है और उसके सर पर स्नेहपूर्ण हाथ की सहलावत की अनुभूति होती है तो दोनों की आँखों के भावना-मिश्रित आँसुओं की धाराएँ पवित्र संगम की धारा की तरह प्रवाहित हो जाती हैं। सियारामशरण गुप्त जी के इस उपन्यास का कथानक अनेक उतार-चढ़ाव तथा पात्रों के तरह-तरह के कृत्यों के साथ आगे बढ़ता हुआ अन्त में कुछ ऐसे मुक़ाम पर पहुँच जाता है कि वातावरण मन को अन्दर तक छू लेनेवाला बन जाता है। यह अत्यन्त रोचक उपन्यास जीवन की उच्च भावनात्मक मनःस्थिति को ऐसे प्रभावी रूप में उद्वेलित कर देता है कि पाठक का मन भी अन्दर तक उद्वेलित हो उठे। Kisi niktasth ki god aisi bhavnatmak, man ko romanchit aur antas ke taron ko chhu lene aur kurer denevali god hoti hai, jiski tulna nahin ho sakti. God mamtamyi man ki ho, snehsikt pita ki ho, har sankat ke samay prashray denevale bade bhai ki ho ya snehamyi bhabhi ki god mein mamta aur santvna ki advitiy kshamta hoti hai. God ka ye mahattv advitiy hai, atulniy hai. Vyakti kitna bhi bhatkav mein ho, apradh kar baitha ho, kintu pashchattap ki bhavna se jab apne varishth niktasth ki god mein sar rakh deta hai aur uske sar par snehpurn hath ki sahlavat ki anubhuti hoti hai to donon ki aankhon ke bhavna-mishrit aansuon ki dharayen pavitr sangam ki dhara ki tarah prvahit ho jati hain. Siyaramashran gupt ji ke is upanyas ka kathanak anek utar-chadhav tatha patron ke tarah-tarah ke krityon ke saath aage badhta hua ant mein kuchh aise muqam par pahunch jata hai ki vatavran man ko andar tak chhu lenevala ban jata hai. Ye atyant rochak upanyas jivan ki uchch bhavnatmak manःsthiti ko aise prbhavi rup mein udvelit kar deta hai ki pathak ka man bhi andar tak udvelit ho uthe.