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Ek Ummid Aur

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चर्चित और यशस्वी उपन्यासकार अभिमन्यु अनत का यह उपन्यास समकालीन उपन्यासों की धारा से कुछ हटकर है जो सहज ही पठनीयता को आमंत्रित करता है। पुनर्जन्म की अवधारणा पर आधारित इस उपन्यास में गर्भस्थ शिशु को नैरेटर बनाकर कथानक का ताना-बाना सिरजा गया है जिसके माध्यम से समकालीन जीवन में... Read More

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Description

चर्चित और यशस्वी उपन्यासकार अभिमन्यु अनत का यह उपन्यास समकालीन उपन्यासों की धारा से कुछ हटकर है जो सहज ही पठनीयता को आमंत्रित करता है। पुनर्जन्म की अवधारणा पर आधारित इस उपन्यास में गर्भस्थ शिशु को नैरेटर बनाकर कथानक का ताना-बाना सिरजा गया है जिसके माध्यम से समकालीन जीवन में बन रहे सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण पर न केवल गहरी और सार्थक चिन्ता है, बल्कि उससे निजात पाने के आवश्यक संकेत भी।
बढ़ते शहरीकरण ने जहाँ प्रकृति की सुन्दरता को विनष्ट किया है, वहीं सियासतदानों की स्वार्थपरता ने मानव-मानव के बीच नफ़रत और हिंसा की गहरी खाई पैदा कर दी है। आम आदमी जो कि इन राजनीतिज्ञों और मज़हबी, साम्प्रदायिक ताक़तों की इस चाल को नहीं समझते हैं, वे इनके झाँसे में आकर इस धरती की सुन्दरता को और इंसानियत के निरन्तर प्रवाह को क्षति पहुँचाते हैं, लेकिन जब एक शिशु के जन्म की वेला आती है तो फिर दुखी और पीड़ित इंसानों के मन में ‘एक और उम्मीद’ की कोंपल फूटती है।
यह उपन्यास इंसानियत की इसी उम्मीद की कोंपल के खिलने की दास्तान है जो अपनी रचनात्मक विशिष्टता और सहज प्रवाह के कारण न केवल पाठकीय संवेदना को स्पन्दित करता है, बल्कि वैचारिक उत्तेजना को भी नया आयाम प्रदान करता है। Charchit aur yashasvi upanyaskar abhimanyu anat ka ye upanyas samkalin upanyason ki dhara se kuchh hatkar hai jo sahaj hi pathniyta ko aamantrit karta hai. Punarjanm ki avdharna par aadharit is upanyas mein garbhasth shishu ko nairetar banakar kathanak ka tana-bana sirja gaya hai jiske madhyam se samkalin jivan mein ban rahe samajik aur prakritik paryavran ke prdushan par na keval gahri aur sarthak chinta hai, balki usse nijat pane ke aavashyak sanket bhi. Badhte shahrikran ne jahan prkriti ki sundarta ko vinasht kiya hai, vahin siyasatdanon ki svarthaparta ne manav-manav ke bich nafrat aur hinsa ki gahri khai paida kar di hai. Aam aadmi jo ki in rajnitigyon aur mazahbi, samprdayik taqton ki is chal ko nahin samajhte hain, ve inke jhanse mein aakar is dharti ki sundarta ko aur insaniyat ke nirantar prvah ko kshati pahunchate hain, lekin jab ek shishu ke janm ki vela aati hai to phir dukhi aur pidit insanon ke man mein ‘ek aur ummid’ ki kompal phutti hai.
Ye upanyas insaniyat ki isi ummid ki kompal ke khilne ki dastan hai jo apni rachnatmak vishishtta aur sahaj prvah ke karan na keval pathkiy sanvedna ko spandit karta hai, balki vaicharik uttejna ko bhi naya aayam prdan karta hai.